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SUMAN MISHRA's Blog – December 2012 Archive (20)

"पाषाण"

कहने को तो चाँद तारे,

आसमा की चादरों से

जड़ के सलमा और सितारे

हम को ये भरमा के हारे

"हैं तो ये पाषाण ही ना "

नदियों का तट चाँद मद्धिम

सूर्य की आभा हुयी कम ,

सतह जल की तल निहारे

चांदनी की परत डारे

"तल में बस पाषाण ही ना"

ह्रदय कोमल, मन सु-कोमल

त्वरित धडका, दौड़ता सा

पागलों की भाँती चाहा

फिर भी उसका मन न…

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Added by SUMAN MISHRA on December 21, 2012 at 2:00am — 3 Comments

"आहट"

हर धड़कन एक आहट जैसी,

वो जो खोया कहीं मिलेगा ,

हर चेहरे में छाया उसकी ,

नहीं नहीं ये वो तो नहीं है .



क्यों हर कविता प्रेम ग्रन्थ सी

क्यों शब्दों में इन्तजार है,

दर्द नहीं बस आकुलता सी

नहीं नहीं ये नेह नहीं है.



खोना पाना , पाना खोना ,

जीवन की ये परिपाटी सी

कुछ मिलता है खोकर देखो

कुछ मिलने से…

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Added by SUMAN MISHRA on December 19, 2012 at 6:30pm — 10 Comments

कहानी : " रोशनी "

चारों तरफ अगर रौशनी का जाल फैला हो मगर इंसान के मन में अँधेरा हो तो शायद एक कदम भी ठीक से नहीं रख सकता. अपनी उलझनों में डूबता उतराता मनुष्य संयम भी खो देता है और परेशानियों के सागर के तल में खुद को खोने लगता है.

ये धर्म गुरु भी ना बस प्रवचन करना जानते हैं और कुछ नहीं , कोई चढ़ावे ना चढ़ाए तब देखो कैसा ज्ञान देते हैं…

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Added by SUMAN MISHRA on December 18, 2012 at 12:00am — 2 Comments

लघु कथा : "अधूरी"

हे ! शुभा तुम बहुत सुंदर हो , तुम्हें फुर्सत में बैठकर उस ऊपर वाले ने बनाया है, इंशा अल्लाह आँखें कितनी सुंदर हैं, ये सब सुनते समझते शुभा उम्र की दहलीज धीरे धीरे पार कर रही थी, ऊपर से जितनी चंचल और शोख अन्दर से कही बहुत शांत बिलकुल झील की सतह की तरह. 

उसकी छोटी बहन की शादी की तैयारियां चल रही हैं शुभा ने अपनी सबसे प्रिय दोस्त सुप्रिया से बताया -क्यों ? वो तो सुंदर भी…

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Added by SUMAN MISHRA on December 17, 2012 at 2:30pm — 6 Comments

आज चांदनी नहीं अन्धेरा

आज चांदनी नहीं अन्धेरा

खतम हुआ सूरज का फेरा

आधा अधूरा चाँद ना आया

राह पे तम ने जाल विछाया

स्वेद बूँद बस मोती छलका

कदम थका तो ख़तम प्रहर था

कांटे विछे या पुष्प सुरभि हो

मलय तेज या…

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Added by SUMAN MISHRA on December 17, 2012 at 12:30am — 4 Comments

हरसिंगार की खुशबू हो तुम

मेरे मन के दरख्त की डाली

झुकी झुकी सी, फूलों सी है

लरज लरज कर बाहों जैसी

याद तुम्हारी कर लेते हैं .

अब यादों की बदली से हम

भीग भीग कर सूख रहे हैं,

एक तुम्हारी चाहत ही है

जिसे अभी तक सींच रहे है

एक अंजुरी नयन नीर से,

एक एक पल जैसे हो पीर से

हर पल हरसिंगार की खुशबू

एक दिलासा मन के तीर (किनारा)…

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Added by SUMAN MISHRA on December 15, 2012 at 10:00pm — 8 Comments

लघु कथा : "अधिकार"

सूरज  बदहवास सा खेतों के मेड़ों पर चला जा रहा था , बचपन में पिता का साया सर से छिन गया था , बहनों की शादी हो चुकी थी, जिनसे उसके उम्र का फासला बहुत था, उम्र अभी १७ वर्ष मगर जिम्मेदारियों का पहाड़ सर पर, गरीबी हो तो इंसान के लिए छोटी छोटी जरूरतें भी पहाड़ जैसी ही लगती हैं. छोटे चाचा ने सारी जमीने अपने नाम करा ली थी..सुरजू,,,,यही नाम था घर में सब प्यार से विषाद…

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Added by SUMAN MISHRA on December 15, 2012 at 9:30pm — 2 Comments

लघु कथा : गुमराह

श्रुति ..हाँ यही नाम था उसका , अभी नयी नयी आयी थी कॉलेज में , सभी उसे विस्मित नजरों से देखते थे, देखना भी था, वो किसी से बात नहीं करती थी, शायद बडे शहर से पढ़ कर आयी थी इसीलिए हम छोटे शहर के स्टूडेंट उसे पसंद नहीं थे, बस वो क्लास में आती. प्रोफेसर का  लेक्चर सुनती और खाली समय में माइल & बून का उपन्यास लेकर पढ़ती रहती. कुछ…

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Added by SUMAN MISHRA on December 15, 2012 at 12:30pm — 4 Comments

स्वप्न तिरोहित मन की बातें

स्वप्न तिरोहित मेरी आँखें ,

क्या तुमको अच्छी लगती हैं?

कुछ डोरे भूले भटके से ,

नयनो में तिरते रहते हैं.

कुछ पलाश के फूल रखे हैं

सुर्ख लाल गहरे से रंग के

अग्निशिखा की छाया जैसी,

निशा द्वार पर जलते बुझते .

भटको मत अब नयन द्वार पर

भ्रमर भ्रमित से रह जाओगे

निशा भैरवी तान सुनेगी ,

अधर पटल सुन दृग खोलेंगे,

गीले बालों…

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Added by SUMAN MISHRA on December 14, 2012 at 11:00pm — 13 Comments

कुछ कहना था तुमसे ...इन्तजार

कुछ कहना था तुमसे मन की

जब आओगे तब कह दूँगी

कब मन ये मेरे पास रहा,

यादों को बाँध के रख लूँगी 



अब दूर देश के…

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Added by SUMAN MISHRA on December 14, 2012 at 6:00pm — 2 Comments

लघु कथा : पगली

आज ऑफिस के लिए निकलते हुए देर हो गयी थी, रास्ते के ट्रेफ्फिक सिग्नलों ने तो नाक में दम कर दिया था, जल्दी से हरे होने का नाम ही नहीं लेते थे, जब ऑफिस को देर होती है तब सारे नियम क़ानून भूल जाते हैं, कही ना कही गलत है मगर ये मानविक भाव है, मगर सिग्नल या सड़क जाम का एक फायदा है , बहुत सारे…

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Added by SUMAN MISHRA on December 14, 2012 at 5:00pm — 2 Comments

हैं मोड़ बहुत सारे यूँ तो ...

हैं मोड़ बहुत सारे यूँ तो

पर दिशा मुझे तय करनी है,

पर मैं ही अकेला पथिक नहीं

आशा सच हो ये परखनी है

सुनता ही नहीं कोई मन की

अब खुद से खुद को सुनना है

संयम गर अपना साथी हो

फिर मंजिल पे ही मिलना है

कुछ ख्वाब नहीं सोने देते

हर पल बस करते हैं बातें

शुरुआत लक्छ्य की आज अभी

सूरज की बात ना तकनी है,

वो आता है हर सुबह…

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Added by SUMAN MISHRA on December 14, 2012 at 1:30am — 9 Comments

लघु कथा : परिवर्तन

ये लो महारानी जी आज नदारद हो गयीं , इन लोगों के मिजाज का कोई ठिकाना ही नहीं है..सुबह सुबह "गौरम्मा" के ना आने से मन खिन्न हो गया , गौरम्मा हमारी काम वाली 

हमेशा तो कह कर जाती थी , माँ ( दछिन भारत में येही संबोधन आदर में देते हैं ) हम कल नहीं आ पायेगा , मगर आज सुबह के ११ बज रहे हैं कोई खबर ही नहीं . दो तीन दिन से मैं उसे कुछ बुझी बुझी देख रही थी , मगर मेहमानों की…

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Added by SUMAN MISHRA on December 14, 2012 at 1:00am — 15 Comments

अब हाथ उनका थाम लें

बचपन की देहरी लांघ कर

सच्चे हुए जज्बात जब

रस्ते जो थे अनजान तब

अब मंजिलों का नाम दें

अब हाथ उनका थाम लें .

जिनकी वजह जीवन मिला

इश्वर तुम्हारा शुक्रिया

अब कर्म की दुनिया में हम

अपना भी योगदान दें

अब हाथ उनका थाम लें

थोड़ी हंसी मासूम सी

मेरी वजह रंगीन सी

माँ से थी जिद्द थोड़ी सुलह

जीवन के मसले हल करें

अब हाथ…

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Added by SUMAN MISHRA on December 13, 2012 at 1:30am — 9 Comments

लघु कथा : "घमंडी"

शानू उठो, देखो पापा शहर से आ गए हैं,,मगर नीद थी की उसे उठने ही नहीं दे रही थी , आज उसे गाँव आये हुए १५ दिन हो गए थे, नंगे पाँव बागों में फिरना कच्चे, अधपके आमों की लालच में , धुल मिटटी से गंदी हुयी फ्रॉक की कोई परवाह नहीं , पूरी आजादी, और फ़िक्र हो भी क्यों उसने अपना इम्तिहान बहुत मन लगाकर दिया था, प्रथम आयी तो ठीक मगर उस सुरेश को नहीं आने देना है , येही मलाल लिए गर्मी की…

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Added by SUMAN MISHRA on December 12, 2012 at 7:00pm — 13 Comments

लघु कथा - "हिम्मत"

आज सुबह से सौरभ उदास था, आज कहाँ जाएगा नौकरी के लिए, घर में किसी को पता नहीं था की उसके नौकरी छूट गयी है, माँ, पिता की दवा लानी है आज और जेब पूरी खाली, अगर सौरभ अपने नौकरी छूटने की बात बता दे,,तो शायद घर में बीमारी और बढ़ जायेगी,,,आखिर नयी चिंता का जन्म हो जाएगा...येही सोचते सोचते जाने कबतक सड़क के किनारे वो भ्रमित सा खडा रहा,,उसे कुछ समझ में नहीं…

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Added by SUMAN MISHRA on December 12, 2012 at 3:00pm — 13 Comments

माँ जब तेरी याद आती है

माँ जब तेरी याद आती है,

बारिश में भीगा मैं जब जब

वो हिदायतें याद आती हैं 

तुमने दी थीं प्यार से मुझको…



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Added by SUMAN MISHRA on December 10, 2012 at 11:30am — 1 Comment

पल पल अपना रूप बदलता ,,,निशा निमंत्रण की खातिर ही

लाल गेंद बन उछल गया है ,

बाल सुलभ ज्यों किलक रहा है

कुछ पल ही में रूप बदलकर

अब यौवन में सिमट गया है

स्वर्ण सी आभा फ़ैल रही है

मिटटी स्वर्ण में परिणित होगी

रेनू जाल के सिरे पकड़ कर

दुर्बल काया भी चल देगी



संध्या की चादर हलकी है

मछुवारे के जाल के जैसी

खींच रही पल पल वो उसको

छिपना होगा निशा से पहले…

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Added by SUMAN MISHRA on December 9, 2012 at 2:03pm — 2 Comments

प्रतिबिम्बों में जी लूं पहले ....

प्रतिबिम्बों में जी लूं पहले ....

By Suman Mishra on Tuesday, 27 November 2012 at 13:25 ·

एक सत्य जो सबको दिखता,

एक सत्य प्रतिबिंबित सा है

वेगवान है जीवन पल पल

रुक थोड़ा तू दिग्भ्रमित क्यों है

जी लूं कुछ पल खुद को खुद में

कह लूं सुन लूं खुद से खुद मैं

एक बार मैं हंस लूं खुद पे

फिर पट…

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Added by SUMAN MISHRA on December 8, 2012 at 1:30pm — 5 Comments

मैं तृप्त नहीं .....क्यों

एक सतह इस धरती पर, धूल , फूल और वृक्ष हैं फैले

एक सतह मन के धरती पर, अंतस तक यादों के झूले

दूर दूर तक आँखों का ताकना, राह वही पर पथिक न मेले

गति और मति दोनों ही संग में , कहाँ किसे अपने संग ले लें ,



कितनी दूर चलोगे संग में वो अदृश्य जो हाथ बढाता

मैं उसकी वो मेरा प्रति पल, गहरा है…

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Added by SUMAN MISHRA on December 8, 2012 at 1:30pm — 6 Comments

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