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Ajay sharma's Blog – December 2014 Archive (6)

मेरी हाथ की वो किताब हो..........

जिसे उम्र भर मैं सुना किया ,

जिसे चुपके-चुपके पढा किया ,

मैं समझ सका न जिसे कभी ,

मेरी हाथ की वो किताब हो ।।



एक बाल था मिरी पलक का ,

जो छुपा रहा मिरी आँख में ,

मुझे जिसकी फिक्र न थी कभी ,

मेरी जिन्दगी का वो ख्वाब हो ।।



जो ठहर गयी मेरी फिक्र थी ,

जो सॅवर गया तेरा ख्याल था ,

जो उतर गयी मेरे दिल के आँगन में ,

वो ठण्डी छॉव हो ।।



तेरे इन्तजार का सिलसिला ,

कभी टूूटता तो मैं जानता ,

मुझे मिला…

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Added by ajay sharma on December 23, 2014 at 10:30pm — 9 Comments

शीत के दुर्दिन का ढो रहे संत्रास , क्या करे क्या न करे फुटपाथ ||

शहरो के बीच बीच सड़कों के आसपास |

शीत के दुर्दिन का ढो रहे संत्रास , क्या करे क्या न करे फुटपाथ || 



सूरज की आँखों में कोहरे की चुभन रही 

धुप के पैरो में मेहंदी की थूपन रही 

शर्माती शाम आई छल गयी बाजारों को 

समझ गए रिक्शे भी भीड़ के इशारों को …

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Added by ajay sharma on December 15, 2014 at 11:10pm — 7 Comments

माँ होती तो ऐसा होता ,..................

माँ होती तो ऐसा होता

माँ होती तो वैसा होता

खुद खाने से पहले तुमने क्या कुछ खाया "पूछा " उसको 

जैसे बचपन में सोते थे उसकी गोद में बेफिक्री से 

कभी थकन से हारी माँ जब , तुमने कभी सुलाया उसको ?

पापा से कर चोरी जब - जब देती थी वो पैसे तुमको 

कभी लौट के उन पैसो का केवल ब्याज चुकाया होता

माँ तुम ही हो एक सहारा

तब तुम कहते अच्छा होता 

माँ होती तो ऐसा होता

माँ…

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Added by ajay sharma on December 14, 2014 at 11:12pm — 9 Comments

मैं हूँ बंदी बिन्दु परिधि का , तुम रेखा मनमानी I

मैं हूँ बंदी बिन्दु परिधि का , तुम रेखा मनमानी I 

मैं ठहरा पोखर का जल , तुम हो गंगा का पानी I I

मैं जीवन की कथा -व्यथा का नीरस सा गद्यांश कोई इक I 

तुम छंदों में लिखी गयी कविता का हो रूपांश कोई इक I 

मैं स्वांसों का निहित स्वार्थ हूँ , तुम हो जीवन की मानी I I…

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Added by ajay sharma on December 14, 2014 at 11:00pm — 14 Comments

पीर पैरों की खड़ा होने नही देती मुझे...............

पीर पैरों की खड़ा होने नही देती मुझे

मेरी देहरी ही बड़ा होने नहीं देती मुझे

फिर वही आँगन की परिधि में बँट गया 

किंतु सीमाएँ मेरी खोने नहीं देती मुझे

उधर पाबंदी ज़माने की हैं हँसनें पे मेरे

इधर दीवारें मेरी रोने नहीं देती मुझे

कर्म के ही हल…

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Added by ajay sharma on December 9, 2014 at 11:00pm — 8 Comments

चित्र हो और कोई , ये गॅवारा नहीं

साथ मेरे चलों , तो चलों उम्र भर ,

दो कदम साथ चलना गॅवारा नहीं।

तुम अधूरे इधर , मैं हूँ अधूरा उधर ,

दोनों आधे जिये , ये गॅवारा नहीं ।

तुम जो कह दो शुरू, तो शुरूआत हो

तुम जो कह दो खतम , सॉस थम जोयगी ।

पंथ कांटों का हो या कि फूलों भरा

तुम नहीं साथ में , ये गॅवारा नहीं ।

लाख नजरों में दिलकश नजारे रहे

किंतु आँखों की देहरी को न छू सके

मेरे सपनों के घर में सिवाय तेरे ,

चित्र हो और कोई , ये गॅवारा नहीं

मैं अकेला रहूँ या रहूँ भीड…

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Added by ajay sharma on December 1, 2014 at 11:00pm — 11 Comments

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