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Ajay Singh's Blog – November 2010 Archive (3)

कविता --" टूटा दिल"

कैसे तुम्हें बताऊँ मैं जो टूटा मेरा दिल है
खाते तरस यदि जानते क्या मेरी मुश्किल है
मैंने सोचा मैं हूँ किश्ती तू मेरा साहिल है
पर न थी खबर मुझे कि तू ही मेरा कातिल है
तुझसे दिल लगा के मुझको क्या हुआ हासिल है
दिल पर जुल्म ढहाने वालों में तू ही शामिल है
जान न पाया था तुझको मैं तू न मेरे काबिल है
मेरी जिन्दगी में अब चरों तरफ गमों की ही महफ़िल है
अब होश मुझे जब आया खुद का तो आंख मेरी बोझिल है
देर से सही अब सोच रहा हूँ कि कहाँ मेरी मंजिल है

Added by Ajay Singh on November 20, 2010 at 11:47am — 2 Comments

भ्रमर -फूल संवाद

गुँजन करता एक भँवरा,जब फूल के पास आया

देख कली की सुन्दरता को मन ही मन मुस्काया ,,

खिली कली को देखकर ,मन ही मन शरमाया

रहा नहीं काबू जब मन पर ,तो एसा फ़रमाया ,,

अरे कली तू बहुत ही सुन्दर ,क्या करूँ तेरा गुणगान

तेरे लिए तो लोग मरते हैं , तू है बड़ी महान, ,

देख तरी सुन्दरता को मन पे रहा न काबू है

दुनिया का मन मोह ले तू ,तुझमे तो वो जादू है ,,

तेरी एक झलक पाने को मैं जीता और मरता हूँ

तेरे न मिलने पे तो मैं, दिन रात आहें भरता हूँ

महक से तेरी महके… Continue

Added by Ajay Singh on November 3, 2010 at 12:00am — 1 Comment

जब रूठ गये अपने

एक बार सब अपने रूठ गये मुझसे

पर क्यों थे रूठे यह पता नही

क़दमों में ला के रख दीं सब नैंमतें उनके

पर उनके दिलों में नफरत वही रही

कोशिश की उनके दिलों में वसने की

मगर उनकी सोच तो वही रही

कशिश की लाख मानाने क़ी मैंने उनको

पर उन पर इसका कोई असर नही

उनके लिए मांगी थीं लाखों दुआएं

पर उनको शायद यह खबर ही नही

दिल खोलकर भी रख देता सामने उनके

पर शायद वो पत्थर दिल पिघलते नही

न जाने वो सब क्यों शक करते हैं मुझपे

अब तक मुझे इस नाइंसाफी की खबर… Continue

Added by Ajay Singh on November 2, 2010 at 3:30pm — 4 Comments

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