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जब रूठ गये अपने

एक बार सब अपने रूठ गये मुझसे
पर क्यों थे रूठे यह पता नही
क़दमों में ला के रख दीं सब नैंमतें उनके
पर उनके दिलों में नफरत वही रही
कोशिश की उनके दिलों में वसने की
मगर उनकी सोच तो वही रही
कशिश की लाख मानाने क़ी मैंने उनको
पर उन पर इसका कोई असर नही
उनके लिए मांगी थीं लाखों दुआएं
पर उनको शायद यह खबर ही नही
दिल खोलकर भी रख देता सामने उनके
पर शायद वो पत्थर दिल पिघलते नही
न जाने वो सब क्यों शक करते हैं मुझपे
अब तक मुझे इस नाइंसाफी की खबर नही
अगर खुदा मेले तो उससे अपना इंसाफ मांगूँ
पर सुना है वो तो कसी को मिलता ही नही
AZAD AJAY
iit Delhi

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Comment by Rash Bihari Ravi on November 20, 2010 at 2:45pm
bahut badhia,
Comment by Ajay Singh on November 17, 2010 at 9:06pm
in these days i m bisy in my exams of b.tech---IIT. after 21 nov i will edit my poetries & share some other.
then i will give enough time to openbooksonline.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 3, 2010 at 6:43pm
अजय जी, बढ़िया रचना है, आप के ख्याल अच्छे है, OBO पर अन्य रचनाओं को भी पढ़े बहुत कुछ सीखने को मिलेगा |
Comment by आशीष यादव on November 3, 2010 at 6:55am
khuda, bhagwaan pta nahi milte ki nahi par apne logo ko jab shak ho jata hai to bahut bura hota hai,
khishor kumar ji ne ek gaana gaya hai jisme kaha hai ki,
dosto shak dosti ka dushman hai,
apne dil me ise ghar banane na do.
logo ko ye samajhna padega.

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