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Lata R.Ojha's Blog – November 2010 Archive (4)

जीवन बिसात के मोहरे मात्र..



इधर नब्ज़ थमती,उधर अश्कों की झड़ी..



इधर टूटती साँस और उधर संजोते हैं आस..



विरक्ति -आसक्ति, आसक्ति-विरक्ति का कैसा खेल??



हैं हम जीवन बिसात के मोहरे मात्र!







इधर गूँजती किल्कारी,उधर जाए कोई बलिहारी..



किसी के माथे पे,भविष्य की चिंता लकीरें..



ममत्व की छाँव तले,अबोध-बोध का निर्बाध मेल..



हैं हम..जीवन बिसात के मोहरे मात्र..







'राम नाम सत्य 'के… Continue

Added by Lata R.Ojha on November 29, 2010 at 1:07am — No Comments

थोड़ा समझो सच को..

मुट्ठी में ख्वाहिशों को बंद करके..



क्यों कहें ज़प्त कर लिया सबकुछ..



रेत जैसे हर बात फिसल जाएगी..



हाथ में झूठ के सच रुकेगा कैसे?





मैं हूँ पत्थर,नही कुछ भी महसूस होता..



आँखें बरसती नही जब भी कोई भूखा बच्चा रोता..



नही रूंधता कंठ तड़पती आहें सुन..



बस..धनलक्ष्मी के कदमों की हूँ आहट सुनता..





क्यों बहकते हो बस एक घूँट लहू का पी के..?



अभी ताउम्र टकराने हैं जाम ये छलकते..



जेब भरती…
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Added by Lata R.Ojha on November 28, 2010 at 2:00am — 1 Comment

अजनबी...

एक एहसास है बाक़ी, तेरे साथ होने का..

एक डर सा कहीं ,तुझे खोने का..

एक द्वंद ,साहस और भय के बीच..

एक निर्णय,तुझ पे बोझ ना बनने का..



सांझ के धूंधलके में,एक ख्वाब सा..

तेरा साथ अपना सा,कुछ पराया सा..

चटखती,टूटती,सहमी सी प्रीत की डोर भी..

शायद..

डर है,तुझे खोने के डर के सच होने का..



सुना था,जो सच में अपना है वो लौट आता है..

जो लौटना ही हो तो क्यों जाता है?

कितने अरमानो को,एहसासों को,… Continue

Added by Lata R.Ojha on November 26, 2010 at 9:57pm — 1 Comment

मेरे तारे.



बैठी देख रही थी तारे..

जाने कितने ..कितने सारे..



छोटी थी तो गिनती थी..

ढेरों सपनों को बुनती थी..

'सप्तऋषि' 'ध्रुव' ढूँढती थी..

अनोखी आकृतियों पे हँसती थी..'



अक्सर देखा करती तारे..

जाने कितने..कितने सारे..

बीता बचपन,बदले सपने..

बदला ढंग देखने का तारे..



लगता था है मुझमें ज्ञान बहुत..

हर बहस जीत खुश होती थी..

अक्सर देखा करती तारे..

अब दूर बहुत लगते सारे..

कुछ…
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Added by Lata R.Ojha on November 24, 2010 at 11:30pm — 1 Comment

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