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सतविन्द्र कुमार राणा's Blog – November 2017 Archive (4)

राजमार्ग का एक हिस्सा(लघुकथा)

राजमार्ग का एक हिस्सा(लघुकथा)



भारी गाड़ियों के आवागमन से कम्पित होता,तो कभी हल्की गाड़ियों के गुजरने से सरर्सराहट महसूस करता हूँ।  घोर कुहरे में  इंसानों की दृष्टि जवाब दे जाती है, मगर मैं दूर से ही दुर्घटना की संभावना  को भांपकर सिहर उठता हूँ।



देखता हूँ नई उम्र को मोटरसाइकिलों पर करतब करते निकलते हुए। बेपरवाही जिसके शौंक में शामिल है।



हाल ही की  तो बात है,ऐसा करते हुए उस किशोर की बाइक गिर कर कचरा हो गई थी। पीछे से आते ट्रक ने दल दिया था उसे। मेरा काला शख्त सीना… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 30, 2017 at 11:42pm — 16 Comments

तालिका छंद

तालिका छंद
सगण सगण(112 112)
दो-दो चरण तुकांत
---
दिन रात चलें
हम साथ चलें
सह नाथ रहें
सुख दर्द सहें

बिन बात कभी
झगड़े न सभी
मन प्रेम भरें
हरि कष्ट हरें

शुभ काम करो
तब नाम करो
सब वैर तजो
हरि नाम भजो

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 12, 2017 at 7:43am — 14 Comments

उनका बस इन्तिज़ार अच्छा था-ग़ज़ल

2122 1212 22/112



उनका बस इन्तिज़ार अच्छा था

यार मैं बे क़रार अच्छा था



गम रहा जो क़रीब दिल के बहुत

वो ख़ुशी से हज़ार अच्छा था



कौन कातिल था देख पाया नहीं

तेज़ नजरों का वार अच्छा था



मेरी उम्मीद तो रही कायम

तेरा झूठा ही प्यार अच्छा था



सौदा दिल का किया हमेशा ही

उनका वो रोज़गार अच्छा था



देख कर जीत की खुशी उनकी

हारना उनसे यार अच्छा था



खीझ कर माँ पसीजना तेरा

मार पर वो दुलार अच्छा… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 9, 2017 at 10:13pm — 12 Comments

तरही गजल

तरही गजल
2122 1212 22

बिन किसी बात रूठ जाने का
क्या करें उनके इस बहाने का?

चैन मिलता है जिसको गम देकर
छोड़ता मौका कब सताने का।

ज्यों क़दम आपके पड़े तो लगा
*बख़्त जागा ग़रीब खाने का*।

जह्र देकर मिज़ाज पूछ रहे
देखो अंदाज आजमाने का।

यूँ भी दीपक कोई जले यारो
हक मिले सबको मुस्कुराने का।


मैल दिल से नहीं गया तो बोल
फाइदा ही क्या आने जाने का

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 5, 2017 at 10:00pm — 10 Comments

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