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सतविन्द्र कुमार राणा's Blog – October 2017 Archive (3)

एक ग़ज़ल

122 122 122 122



न तकरार समझी न समझा गिला है

बुरी आदतों का यही फाइदा है



गलत ही तलाशा था मय में नशे को

निगाहों में जबके नशा ही नशा है



न अल्फाज कुछ भी बयां कर सकें हों

जो दिल में बसा आँखों से दिख रहा है



ये चेहरे पे रौनक न जाने है कैसे

जिगर जबकि छलनी हमारा हुआ है



किसी तिफ्ल के रूठ जाने से सीखें

भुलाना किसी को अगर सीखना है



बना लो मुहब्बत को औजार यारो!

शज़र नफरतों के अगर काटना है



क़मर पे चढ़ी जा… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 16, 2017 at 10:30pm — 11 Comments

तरही गजल

1222 1222 122

कभी जिसमें कहीं अड़चन नहीं है
हो कुछ भी वो मग़र जीवन नहीं है

तराशा जाए तो पत्थर भी चमके
तपाए बिन कोई कुंदन नहीं है

बिना उलझे नहीं आता सुलझना
मज़ा ही क्या अगर उलझन नहीं है

अगर हैं जीतने की ख़्वाहिशें तो
न सोचो हारने का मन नहीं है

बहारें हर तरफ़ आने लगी हैं
खिला इक बस मेरा गुलशन नहीं है

नहीं अनबन, नहीं शिकवा ही कोई
*बस इतना है कि अब वो मन नहीं है*

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 11, 2017 at 11:30pm — 10 Comments

बचपन

*बचपन*



न समंदर-सा गहरा,न पर्वत-सा ऊँचा



न ही लताओं-सा उलझा



जटिल तो हो ही नहीं सकता है



बचपन



क्योंकि बड़ा सादा-सा होता है



बचपन



बड़ा सीधा-सा होता है



बचपन



खुली उन्मक्त हवा-सा बहता है



करता है अठखेलियां



विभिन्न पत्तियों से



टहनियों से



कभी-कभी हिला देता है



वृक्ष को भी जड़ तक



क्योंकि बहती हवा-से



बचपन का विवेक इतना ही



होता… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 8, 2017 at 10:37pm — 4 Comments

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