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Rahul Dangi Panchal's Blog – July 2015 Archive (7)

सरसी मिलिन्दपाद छन्द (ओबीओ मंच को समर्पित)

सरसी मिलिन्दपाद छन्द ।
१६,११ पदान्त में (२१ गुरु,लघु)अनिवार्य
आज गुरुपूर्णिमा पर आदरणीय ओबीओ मंच को समर्पित ।
.
हे जीवन पथ के निर्माता,तुम पे है अभिमान।
तुम ही मात-पिता हो मेरे,तुम ही हो भगवान।
तुम ने दीप ज्ञान का देकर,किया बडा आभार ।
जन्मों जनम तक भी न उतरे,तेरा ये उपकार।
ब्रह्मा,विष्णु,महेश,मुरारी,गुरु चरणों में राम।
तन,मन,धन,सब कुछ अर्पण कर,करूं गुरुवर प्रणाम ।

मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by Rahul Dangi Panchal on July 31, 2015 at 10:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल- काश अपना भी घौंसला होता।

२१२२ १२१२ २२



काश अपना भी' घौंसला होता।

मैं किसी घर का' लाडला होता।



माँ पिता जी की' गोद में मैं भी।

खेलता कूदता पला होता।



वासना को कहें मुहब्बत सब।

अब नहीं इश्क बावला होता।



शक्ल से तो बडा भला है वो।

काश दिल से जरा भला होता।



उम्र तन्हाँ न यूँ गुजरती गर।

इक कदम का भी' हौसला होता।



मैं न कहता कभी खुदा से दोस्त।

आज इंसाफ अगर चला होता।



शुक्र है वो यहाँ नहीं वरना।

जलजला और जलजला… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on July 26, 2015 at 9:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल- कर्म की योग्यता नहीं देतें।

२१२२ १२१२ २२

आजकल सभ्यता नहीं देतें।

बाप भी शिष्टता नहीं देतें।



पेड,पौधें,नदी,जलाशय अब।

स्वर्ग का रास्ता नहीं देतें।



चार पन्नें किताब के मित्रों।

कर्म की योग्यता नहीं देतें।



क्या करूं इस समाज में जी कर।

लोग गर साम्यता नहीं देतें।



तब तलक चुप नहीं रहेंगे हम।

जब तलक सच जता नहीं देतें।



खोल बैठें दुकान अध्यापक।

दाम बिन शिष्यता नहीं देतें।



बात क्या है?जहान को रब जो।

आप अपना पता नहीं… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on July 25, 2015 at 4:00pm — 7 Comments

ग़ज़ल- हमारा दिल जलाकर आँख का काजल बनाती है।

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

हमारा दिल जलाकर आँख का काजल बनाती है।

बडी जालिम है' पलकों पर मे'री बादल बनाती है।



निगाहे गर्म वो उसकी मसीहा भी है' कातिल भी।

कभी मरहम लगाती है कभी घायल बनाती है।



महकता है चमन सारा तुम्हारे तन की' खुशबू से।

तुम्हारी ही नकल से शाखे गुल कोंपल बनाती है।



जहाँ सहरा बनाया है खुदा तेरे फरिश्तों ने।

वहाँ उस शख़्स की मौजूदगी जंगल बनाती है।



हवा तेरा बदन छूकर अगर छू ले किसी को फिर।

ते'रा आशिक बनाती है ते'रा कायल… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on July 22, 2015 at 7:48am — 18 Comments

गीत- इश्क का जला/एक कोशिश

मुखडा -१६
अन्तरा- १४
इश्क का जला,इश्क का जला।
इश्क का जला, इश्क का जला ।

दिल से मेरे निकले धुआँ
कैसे करूं ये गम बयाँ
ये बेबसी की दास्ताँ
है कौन समझेगा यहाँ
जो अब तलक दिल में रहा
वो भी न मुझको पढ़ सका
इश्क का जला------

इक बार भी सोचा नहीं
परखा नहीं समझा नहीं
दिल से कभी देखा नहीं
तूने मुझे जाना नहीं
मजबुरीयों ने रोक रक्खा
है मेरा हर रास्ता
इश्क का जला-------

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Rahul Dangi Panchal on July 18, 2015 at 11:58pm — 4 Comments

ग़ज़ल-नजर मिल रही थी तो दिल डर गया।

१२२ १२२ १२२ १२



नजर मिल रही थी तो दिल डर गया।

नजर से बचे तो जिगर मर गया।।



अभी पाँव रक्खा ही था इश्क में।

बडी तेज सर पर से पत्थर गया।।



कदम कोई अपना मेरी कब्र पर।

जहाँ पर जिगर था वहाँ धर गया।।



नजर थी,बला थी, वो क्या थी मगर।

उसे सोचते सोचते मर गया ।।



जमाने ने सर पर बिठाया उसे।

जरा सी उछल कूद जो कर गया।।



फना हो गयी है शराफत या रब।

या है ही नहीं तू या फिर मर गया।।



हँसाने की कोशिश करों उसको… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on July 8, 2015 at 10:44pm — 11 Comments

गजल- दिलबर का दीदार जिन्दगी

२२ २२ २२ २२



कहीं पे' ठण्डी' बयार जिन्दगी ।

कहीं लगे अंगार जिन्दगी ।।



पतझड और बहार जिन्दगी ।

सुख दुख का व्यापार जिन्दगी ।।



जाने कितने रंग से' खेलें।

होली का त्यौहार जिन्दगी ।।



नानी माँ की गोद में' है तो।

इमली,आम,अचार जिन्दगी ।।



इश्क के' मारों से जो पूछा।

दिलबर का दीदार जिन्दगी ।।



उनके होंटों के साहिल पर।

फूलों सी रसदार जिन्दगी ।।



कौन समझ पाया है इसको।

उलझन का संसार जिन्दगी ।।…

Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on July 1, 2015 at 2:00pm — 18 Comments

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