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सरसी मिलिन्दपाद छन्द (ओबीओ मंच को समर्पित)

सरसी मिलिन्दपाद छन्द ।
१६,११ पदान्त में (२१ गुरु,लघु)अनिवार्य
आज गुरुपूर्णिमा पर आदरणीय ओबीओ मंच को समर्पित ।
.
हे जीवन पथ के निर्माता,तुम पे है अभिमान।
तुम ही मात-पिता हो मेरे,तुम ही हो भगवान।
तुम ने दीप ज्ञान का देकर,किया बडा आभार ।
जन्मों जनम तक भी न उतरे,तेरा ये उपकार।
ब्रह्मा,विष्णु,महेश,मुरारी,गुरु चरणों में राम।
तन,मन,धन,सब कुछ अर्पण कर,करूं गुरुवर प्रणाम ।

मौलिक व अप्रकाशित ।

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 2, 2015 at 2:06pm

भारतीय छन्द विधान समूह में दोहा की शुद्धता से सम्बन्धित एक आलेख है. आप उसमें देखें. 

ओबीओ के मुख्यपृष्ठ पर छन्द मञ्जरी को प्राप्त करने की जानकारी है. आप उसका लाभ ले सकते हैं. मुझे विश्वास है, कविता की गेयता सम्बन्धी कई समस्याओं का समाधान होगा. 

Comment by Rahul Dangi Panchal on August 2, 2015 at 12:58pm
शुक्रिया आदरणीय हर्ष महाजन जी
Comment by Harash Mahajan on August 2, 2015 at 12:33pm
राहुल डांगी जी बहुत बहुत बधाई इस प्रस्तुति के लिए । आपके माध्यम से एक नए छंद के बारे में मालूम हुआ ।सादर ।
Comment by Rahul Dangi Panchal on August 2, 2015 at 11:31am
आदरणीय सौरभ जी नमन।
सर भारतीय छन्द विधान में मुझे सरसि छन्द नहीं मिल रहा है क्रपया आप लिंक भेजने का कष्ट करें ।

सादर निवेदन ।
Comment by Rahul Dangi Panchal on August 2, 2015 at 7:29am
आदरणीय सौरभ जी नमन। इस छन्द पर यह मेरी पहली कोशिश थी मै पुन: अभ्यास करता हूँ। सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 2, 2015 at 1:46am

भाई राहुल डांगीजी, आपका समर्पण कई बार चकित कर देता है. ओबीओ वस्तुतः हमसभी का गुरु है. समवेत सीखना-सिखाना इस मंच की परिपाटी है. आप जैसे रचनाकर्मरत सदस्यों का गुरु-पूर्णिमा के शुभ-अवसर पर भावमय हो जाना सहज भवदशा है. अतः, अपेक्षित है.
प्रस्तुति केलिए हार्दिक शुभकामनाएँ.


जहाँ तक सरसी छन्द का सवाल है, उसकी परिभाषा देख लें - सरसी छंद - 16-11 की यति पर. चार पदों यानि आठ चरणों का छन्द जिसके दो-दो पद तुकान्तता में होते हैं. [विषम चरणांत के लिए कोई विशेष नियम नहीं] 

 

इस हिसाब से आपकी प्रस्तुति चार पदों की शर्त पूरा नहीं करती. इस हिसाब से तोआप डेढ़ छन्द ही प्रस्तुत कर पाये.

अंतिम पद में अंतिम चरण यानी अंतिम सम चरण ’करूँ गुरुवर प्रणाम’ को ’गुरुवर करूँ प्रणाम’कर लें.
गुरुवर’ चौकल (चार मात्रिक) शब्द के बाद आया ’करूँ’ ’प्रणाम’ के ’प्रणा’ से मिलकर षटकल शब्द-समुच्चय बना लेता है. और गेयता सध जाती है.

इस अभ्यास और आत्मीय समर्पण केलिए हार्दिक शुभकमनाएँ.
शुभेच्छाएँ

पुनश्च - 

इस मंच के भारतीय छन्द विधान समूह में आप सरसी छन्द पर मूलभूत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं. 

Comment by Rahul Dangi Panchal on August 1, 2015 at 4:51pm
आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी मेरा तो यह मंच ही गुरु है ईश्वर से यही दुआ करता हूँ इस का स्नेह मुझसे यूं ही बना रहे।
नमन।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 1, 2015 at 3:47pm

आदरणीय राहुल भाई जी, गुरुपूर्णिमा पर ओबीओ मंच को समर्पित इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.

कृपया ध्यान दे...

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