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Er. Ganesh Jee "Bagi"'s Blog – July 2010 Archive (3)

सदन खड़ी द्रोपदी बनकर...

कौरव पांडव मिल चीर खीचते ,

सदन खड़ी बेचारी द्रोपदी बनकर,

हाथ जोड़े लुट रही थी वो अबला,

कृष्ण ना दिखे किसी के अन्दर ,



चुनाव का चौपड़ है बिछने वाला ,

शकुनी चलेगा चाल,पासे फेककर,

खेलेंगे खेल दुर्योधन दुश्शाशन ,

होगा खड़ा शिखंडी भेष बदलकर,



हे!जनता जनार्दन अब तो जागो,

रक्षा करो कृष्ण तुम बनकर,

दिखाओ,तुम्हे भी आती है बचानी आबरू ,

"बागी" नहीं जीना शकुनी का पासा बनकर,…

Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 21, 2010 at 8:00pm — 22 Comments

मैं घबरा जाता हूँ...

मैं घबरा जाता हूँ यह सोच सोच कर ,
कैसे कोई गरीब अपना घर चलाता होगा,

सौ लाता है मजदूर पूरे दिन मर कर,
कैसे भर पेट दाल रोटी खा पाता होगा,

बीमार मर जायेगा दवा का दाम सुनकर,
हे! ईश्वर कैसे वो ईलाज कराता होगा,

मुर्दा डर जायेगा लकड़ी की दर सुनकर,
कैसे कोई मजलूम शव जलाता होगा ,

लगी है आग गंगा में महंगाई की "बागी",
कैसे कोई अधनंगा डुबकी लगाता होगा ,

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 17, 2010 at 3:00pm — 16 Comments

पहली ग़ज़ल

वो इक अलाव सा जिगर में लिए फिरते हैं ,

चिराग महल के झोपडी के खूँ से जलते हैं !



बंद भारत ने ठंडे कर दिए चूल्हे लाखों ,

है किस तरह की जंग रहनुमा जो लड़ते हैं



रोटियां सेंकते लाशों पे आपने लालच की,

ये कर्णधार मुझे तो जल्लाद लगते हैं !



वो ढूँढते है भगवान को मंदिर की ओट से,

हमारी आस्था ऐसी जो चक्की भी पूजते हैं !



अपना जाना जो उन्हें जान जाएगी "बागी"

वो ज़हरी नाग हैं जो आस्तीं में रहते है !



( मैं आदरणीय योगराज प्रभाकर जी ,… Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 10, 2010 at 11:30pm — 10 Comments

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