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Sushil Sarna's Blog – June 2014 Archive (8)

सावन का था महीना .....

सावन का था महीना ......

वो आ के छम्म से बैठी मेरे करीब ऐसे

बरसी हो बादलों से सावन की बूंदें जैसे

सावन का था महीना

मदहोश थी ...हसीना

गालों पे .लग रही थी

हर बूँद ..इक नगीना

आँचल निचोड़ा उसने ..मेरे करीब ऐसे

बरसी हो बादलों से ख़्वाबों की बूंदें जैसे

पलकें झुकी हुई थीं

सांसें ..रुकी हुई थीं

लब थरथरा .रहे थे

पायल थकी हुई थी

इक इक कदम वो मेरे आई करीब ऐसे …

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Added by Sushil Sarna on June 25, 2014 at 7:30pm — 14 Comments

दिल में सोंधी महक … (एक हास्य रचना )

दिल में सोंधी महक (एक हास्य रचना )

अरे! ये क्या हुआ

कल ही तो वर्कशाप मेंठीक करवाया था

टेस्ट ड्राईव भी करवाई थी

कार्य प्रणाली

बिलकुल ठीक पाई थी

माना टक्कर बहुत भारी थी

कई टुक्क्डे हो गए थे

मगर वर्कशाप में

कमलनयनी ब्रांड के नयनों के फैविकोल से

टूटे दिल के टुकड़े अच्छी तरह चिपकाए थे

उसकी मधुर मुस्कान ने ओके किया था

दिल फिर

अपनी ओरिजनल कंडीशन…

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Added by Sushil Sarna on June 24, 2014 at 1:30pm — 16 Comments

मैं बहुत जीता हूँ, …….

मैं बहुत जीता हूँ, …….

जीता हूँ ….

और बहुत जीता हूँ …..

ज़िन्दगी के हर मुखौटे को जीता हूँ //

हर पल …..

इक आसमाँ को जीता हूँ ……

हर पल …….

इक जमीं को जीता हूँ //

मैं ज़मीन -आसमाँ ही नहीं …..

अपने क्षण भंगुर …..

वजूद को भी जीता हूँ //

कभी हंसी को जीता हूँ ….

तो कभी ग़मों के जीता हूँ …..

जिंदा हूँ जब तक …..

मैं हर शै को…

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Added by Sushil Sarna on June 22, 2014 at 8:30pm — 22 Comments

अहं के ताज़ को

अहं के ताज़ को ……………

पूजा कहीं दिल से की जाती है

तो कहीं भय से की जाती है

कभी मन्नत के लिए की जाती है

तो कभी जन्नत के लिए की जाती है

कारण चाहे कुछ भी हो

ये निशिचित है

पूजा तो बस स्वयं के लिए की जाती है

कुछ पुष्प और अगरबती के बदले

हम प्रभु से जहां के सुख मांगते हैं

अपने स्वार्थ के लिए

उसकी चौखट पे अपना सर झुकाते हैं

अपनी इच्छाओं पर

अपना अधिकार जताते हैं

इधर…

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Added by Sushil Sarna on June 19, 2014 at 12:30pm — 16 Comments

अपनी हर सांस में …

अपनी हर सांस में …

अपनी हर सांस में...तुझे करीब पाता हूँ

तुझे हर ख्याल में अपना हबीब पाता हूँ

बिन तेरे ज़िंदगी की हर मसर्रत है झूठी

राहे वफ़ा में तुझे अपना नसीब पाता हूँ

तुम्हारे वाद-ए-फ़र्दा पर ..यकीं करूँ कैसे

हर दीद में इक तिश्नगी ..अजीब पाता हूँ

कूए कातिल से गुजरना ..आदत है मेरी

अपने ज़ख्मों में .अपना अज़ीज़ पाता हूँ

रूए-ज़ेबा को भला ज़हन से भुलाऊँ कैसे

बिन तुम्हारे तो मैं खुद को गरीब पाता…

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Added by Sushil Sarna on June 17, 2014 at 4:30pm — 20 Comments

3 मुक्तक

3 -मुक्तक

1.

हर रंज़ पे .मुस्कुराता हूँ

तन्हा तुझे गुनगुनाता हूँ

किस रंग पे मैं यकीं करूँ

हर रंग से फ़रेब खाता हूँ

..................................

2.

हर तरफ बाज़ार नज़र आता है

हर रिश्ता लाचार नज़र आता है

अब गुल नहीं महकते बहारों में

हर शाख़ पर ख़ार नज़र आता है

.......................................................

3.

रास्ते बदल जाते हैं ...तूफाँ जब आते हैं

यादों के अब्र में ...अरमाँ पिघल जाते हैं

रुकते नहीं अश्क.…

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Added by Sushil Sarna on June 12, 2014 at 1:00pm — 18 Comments

अपने मौसम को ………

अपने मौसम को ………

तुम ही तो थे

मेरे नेत्रों के वातायन से

असमय विरह पीर को

बरसाने वाले

मुझे अपने बाहुपाश में

प्रेम के अलौकिक सुख का

परिचय कराने वाले

मेरी झोली में विरह पलों को डालने वाले

क्या आलिंगन के वो मधुपल भ्रम थे

पर्दे के पीछे मेरी विरह वेदना को

सिसकियों में पिघलते

मूक बन कर देखते रहे

क्यों एक बार भी हाथ बढ़ा कर

मेरे व्यथित हृदय को

ढाढस…

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Added by Sushil Sarna on June 5, 2014 at 4:56pm — 16 Comments

मैं मूक बन जाती हूँ …।

मैं मूक बन जाती हूँ …।

नहीं, अब मैं इस गहन तम में नभ को न निहारूंगी

अपनी अभिलाषाओं को तम के गहन गर्भ में दबा दूंगी

दर्द की नमी को पलकों में ही दफना दूंगी

अपने गिले -शिकवों का बवंडर अपने दिल के किसी कोने में छुपा लूंगी

कितना विशवास था

तुम तो मेरे हृदय की टीस को पहचानोगे

यौवन की दहलीज़ पर पाँव रखते ही

हर निशा मैं तुम्हें निहारती थी

शशांक मेरे पागलपन पर मुस्कुराता था

पवन मुझे…

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Added by Sushil Sarna on June 2, 2014 at 12:39pm — 18 Comments

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