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AjAy Kumar Bohat's Blog – May 2012 Archive (8)

" फैशन "

कितना कठिन हो जाता है

लिखना

कई बार

'फैशन' के अनुरूप

कैसे साध रखा है हमने

अपने मन को

की वह सोचता है

बिलकुल किसी कंप्यूटर प्रोग्राम की तरह

किस तरह रख पाते हैं हम

अपने मन के भावों को

अनुशासन में

और

वे प्रकट होते हैं

केवल

एक दिवस-विशेष पर...

एक विशेष दिन ही जागता है जज़्बा देश-प्रेम का

या

मातृ-पितृ भक्ति का..

किसी एक दिन ही

आती है

भूली-बिसरी

बहन की याद..

ऐसे ही कई लोग हैं…

Continue

Added by AjAy Kumar Bohat on May 13, 2012 at 9:30pm — 13 Comments

...आरुषि...

मेरी बात को सुन लड़की,

कुछ सपने मत बुन लड़की

सपनो को लगेगा घुन लड़की

मेरी बात को सुन लड़की...



मेरी बात मान लड़की

कुचल अपने अरमान लड़की

राक्षशों को पहचान लड़की

मेरी बात मान लड़की...



मत कर तू प्यार लड़की

ऐतराज़ करेगी 'तलवार' लड़की

बहुत तेज़ है धार लड़की

मत कर तू प्यार लड़की...



चीरती है सब जहां की ख़ामोशी

कौन समझ रहा माँ की ख़ामोशी

ठन्डे पड़े जिस्मोजां की ख़ामोशी

चीरती है सब जहां की ख़ामोशी



मेरी बात को सुन…

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Added by AjAy Kumar Bohat on May 13, 2012 at 9:09pm — 5 Comments

...सिग्रेट...(२)

होठों से छुआ भी…

Continue

Added by AjAy Kumar Bohat on May 13, 2012 at 9:07pm — 11 Comments

" तब और अब "

पहले हँसता था
खुश था
पर लोग दुखी थे
सो करते थे दुखी
अब एक उदासी ओढ़ ली है
और
चुप रहता हूँ
चिपका लिया है दुःख का मुखौटा
पर
अब लोग खुश हैं
दुःख को देख कर
और मैं उनको सुखी देख कर
खुश हूँ 
फर्क इतना है...
पहले अपने ही में खुश था
अब जान लिया है लोगों की ख़ुशी…
Continue

Added by AjAy Kumar Bohat on May 12, 2012 at 8:00pm — 10 Comments

" सिगरेट "

मैं एक जिस्म हूँ
सिर्फ 
एक ठंडा जिस्म
और मेरा
ठंडा बेजान जिस्म
पड़ा है लावारिस
कई जगहों पर
रास्तों में, फुटपाथ पर, कूड़े के ढेर पर,
बसों में, रेलवे-प्लेटफार्म पर 
लोगों की ठोकरों में,
पैरों में आता हुआ
या फिर
मिल जाउंगी सुलगती..
ऐश-ट्रे में
जो सजी है मेज पर
और ... मेज
घर की…
Continue

Added by AjAy Kumar Bohat on May 12, 2012 at 7:44pm — 8 Comments

‎" ए.सी. और प्राइवेसी "

हे ईश्वर 

यह सच है की,

मैंने चाहा 'ए.सी' 

ये भी सच

मैंने माँगी 

'प्राइवेसी' 

हे अंतर्यामी 

रही चाहत मेरी सदैव 

रहूँ मैं लाईम-लाईट में

और

टिका रहे हर वक़्त मुझ पर ही कैमरा

आती रहे निरंतर कानो में

हरे-हरे नोटों के

फड़फड़ाने की आवाज़...

लेकिन

मेरी मुद्दत की तमन्नाओं का

ये क्या तर्जुमा.... मेरे परवरदिगार

आज खड़ा हूँ मैं बन कर

ATM का चौकीदार !!!



~…

Continue

Added by AjAy Kumar Bohat on May 11, 2012 at 9:59pm — 6 Comments

~ कविता के पंछी या पंछियों की कविता ~

थिरक-थिरक
नाचता   मोर ... फिर 
देख  कर
पाँव अपने
हो जाता बोर
---
कुहू कुहू गाती कोयल
मन को मनभाती कोयल
पराये घोंसले में देकर अंडे
कहाँ जाने फुर्र हो जाती कोयल 

© AjAy Kum@r

Added by AjAy Kumar Bohat on May 11, 2012 at 11:56am — 6 Comments

भीड़...अजय कुमार बहोत

मैं
भीड़ हूँ
इस लोकतंत्र के ढाँचे की मैं रीढ़ हूँ
जी हाँ
मैं भीड़ हूँ...

तिनका-तिनका जोड़ता दिन का
रोज़ बिखरता-जुड़ता
मन-आशाओं का नीड़ हूँ
मैं भीड़ हूँ...

कहाँ फुर्सत
वैष्णव-जन को,
की जाने मुझ को
एक परायी पीड़ हूँ
मैं भीड़ हूँ...

~ © AjAy Kum@r

Added by AjAy Kumar Bohat on May 11, 2012 at 11:30am — 10 Comments

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