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“ पितृ-सत्ता से संवाद “

नारी को दुर्गा, नारी को शक्ति, नारी को जननी , कह कर बुलाते हो

और जब वो नन्ही सी बेटी बन कर आये

इस खबर से क्यों तुम डर जाते हो…

जानते हो भलीभांति , जब खोली तुमने आँखें

तो पाया माँ का प्यार ,

बहन का दुलार

आगे किसी मोड़ पर जीवन-संगिनी भी मिली

सेवा समर्पण लिए

 

प्रश्न मेरा केवल इतना है तुमसे, लेकिन

क्या सीखा है तुमने ... केवल लेना ही लेना ???

तुमको तो बनाया है, सर्वथा-शक्तिशाली

उस सर्व-शक्तिमान ने

तभी तो सत्तासीन होते ही

घोषित हुए तुम

स्वयंभू प्रतिनिधि , इस धरा पर

सर्व-शक्तिमान के,

और लगे कहलाने मजाज़ी-खुदा * तक

हुआ न संकोच ज़रा भी

परमेश्वर तक कहलाने में

लेकिन फिर क्यूँ है भीतर

ये कम्पन, ये भय , ये झिझक

थोडा सा तो बदल कर देखो

"पुरुष" को अपने भीतर के

जगाओ थोड़ी सी हिम्मत

जहां मन के किसी कोने में, घने अँधेरे के बीच

बैठा है कोई, डरा सा…  सहमा सा…

जहां झाँकने नहीं देते, तुम किसी को भी

जहां जाने नहीं देते तुम 'खुद' को भी

वहां तक पहुंचना होगा तुमको स्वयं ही

और लानी होगी ढूंढ कर, वो आवाज़

जो कह सके,

बेटी मैं हूँ ना…।

बेटी मैं हूँ ना…।

 

  • मजाज़ी खुदा = लौकिक परमेश्वर

 

© AjAy Kum@r ~

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by AjAy Kumar Bohat on November 25, 2013 at 9:59pm

Saurabh ji main Delhi mein rahta hoon...

Comment by AjAy Kumar Bohat on November 25, 2013 at 9:56pm

 हौसला अफजाही  के लिए सभी  ज्ञानी  सज्जनो का शुक्रिया


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 26, 2013 at 8:25pm

भाई, आप कहाँ रहते हैं ?

शुभेच्छाएँ.

Comment by ram shiromani pathak on August 20, 2013 at 2:03pm

आदरणीय सुन्दर प्रस्तुति //हार्दिक बधाई आपको 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 19, 2013 at 8:28pm

मातृ शक्ति की वर्तमान स्थिति और स्त्री भ्रूण हत्या दोनो को भेदती हुई मार्मिक रचना के लिये बधाई !

कृपया ध्यान दे...

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