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दुष्यंत सेवक's Blog – May 2010 Archive (4)

इसी जद्दोज़हद में

इसी जद्दोज़हद में
ज़िन्दगी बसर कर रहे हैं
हर्फ़ हर्फ़ जोड़ कर ज्यों
सफे भर रहे हैं

अधूरी है रदीफ़
काफिया नहीं है पूरा
तुकबंदी मिलाने की बस
जुगत कर रहे हैं

ज़िन्दगी गो कि
इक ग़ज़ल है
रूठा हुआ हमसे
अभी ये शगल है
अशआरों की तरह
उमड़ते हैं
चेहरे कई लेकिन
'मीटर' जो बैठ जाए
वही भर पन्नो पर
उतर रहे हैं
दुष्यंत .............

Added by दुष्यंत सेवक on May 31, 2010 at 4:31pm — 9 Comments

आज की ग़ज़ल

इस पिघलती शाम को अपना बनाया जाए
उसका ज़िक्र छेड़ो, कुछ सुना-सुनाया जाए

आंखों में खलल देती है शमअ बेवफा
बुझा दो इसे, वफ़ा का सबक सिखाया जाए

अक्सर ख़याल-ऐ-यार ही देता है खुमारी
ज़रा जाम भी भरो यारों, इसे और बढाया जाए

गहराया है नशा, ज़रा तेज़ रक्स हो
गहरा गई है रात, ख़्वाब कोई सजाया जाए
दुष्यंत......

Added by दुष्यंत सेवक on May 21, 2010 at 11:42am — 5 Comments

दियार-ऐ-इश्क़* से गुजर जाने से पहले,

दियार-ऐ-इश्क़* से गुजर जाने से पहले,

थे होशमंद, न थे दीवाने से पहले

*इश्क का शहर



सब्ज़ बाग़, सुर्ख गुल हम देख ही न पाये,

खिजां आ गई बहार आने से पहले



बज़्म* में उनकी मुहब्बत एक तमाशा है,

मालूम न था हमें, वहां जाने से पहले

*बज़्म- महफिल



मेरा नाखुदा* तो नाशुक्रा निकला,

रज़ा भी न पूछी, डुबाने से पहले

*नाखुदा- मल्लाह, नाविक



कैस, फरहाद, रांझा तो बीते दिनों की बात है,

राब्ता* रखिये जनाब, नए ज़माने से पहले

*राब्ता-… Continue

Added by दुष्यंत सेवक on May 20, 2010 at 1:05pm — 14 Comments

घिर आये स्याह बादल सरे शाम

घिर आये स्याह बादल सरे शाम
स्याह*-काले
और उदास ये जेहन क्यूँ हुआ
जेहन*-मन
पोशीदाँ अहसास क्यूँ उभर आये
पोशीदाँ*-छुपा हुआ
ये दिल तनहा दफ्फअतन क्यूँ हुआ
दफ्फअतन*-अचानक
यूँ तो अब तक चेहरे की ख़ुशी छुपाते थे
ग़म छुपाने का ये जतन क्यूँ हुआ
कोई चोट तो गहरी लगी होगी
ये संगतराश यूँ बुतशिकन क्यूँ हुआ
संगतराश*-मूर्तिकार, बुतशिकन*-मूर्तिभंजक
दुष्यंत......

Added by दुष्यंत सेवक on May 20, 2010 at 12:30pm — 7 Comments

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