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ASHUTOSH JHA's Blog – April 2017 Archive (2)

"मेरे दोस्त"

कई पेड़ों की तरह वह भी एक पेड़ था

शब्दों के खांचों से दूर.............



छुटपन में कभी कोई गुठली फेंक दिया था

प्रकृति ने अपना काम शुरू किया था



समय गुज़रा लाल कोंपल था दिखा

ख़ुशी हुई बच्चे ने बच्चे को देखा



एक पेड़ जो मुझे जन्म से देख रहा था

एक पेड़ जिसको जन्म से मैं देख रहा था



एक अनजान दरख़्त

एक थोड़ा जाना पहचाना ........



मेरे दुआर का पेड़ मेरी ऊँचाई लाँघ गया

ख़ुशी ख़ुशी मैं उसके कंधों पर भाग गया



बहुत से जीव मेरे… Continue

Added by ASHUTOSH JHA on April 9, 2017 at 4:26pm — 8 Comments

अपने दिल की कहाँ सुनता हूँ

मैं अपनी कमीज़ गंदी करके पहनता हूँ।
मैं आज भी चाय ठंडी करके पीता हूँ।

सुबह की धूप से मेरी मौसिकी नहीं आज भी।
रात की यारी मैं आज भी पक्की करके जीता हूँ।

न सताया करो देखकर यूँ कभी-कभी।
मैं आज भी ज़ेहन में तुमसे कत्ल होकर मिलता हूँ।

खुश है कि नहीं कोई परिंदा दिल का।
कैसे हो पता मैं आज भी अपने दिल की कहाँ सुनता हूँ।


-------------------------------------------

मौलिक और अप्रकाशित

Added by ASHUTOSH JHA on April 2, 2017 at 12:06am — 6 Comments

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