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Neeraj tripathi's Blog – April 2011 Archive (5)

मकड़ियाँ दिलों की

बड़ी शिद्दत से इनकी आवाजाही रंग लायी है,
किसी का न तिलक और न कहीं कोई सगाई है,
सफ़ाई रोज़ होती है, हठी ये गिर कर पलती है,
मगर फिर भी दीवारों पर मेरे चुपचाप चलती है,…
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Added by neeraj tripathi on April 25, 2011 at 3:30pm — 2 Comments

मेरे गाँव के जाड़े की रात

सब कुछ शांत है...मौन | दो छूहों पर टिकी छप्पर वाली दालान में रजाई ओढ़े हुए मैं इस सन्नाटे की आवाज़ सुनने की कोशिश करता हूँ | इस रजाई की रुई एक तरफ को खिसक गयी है; लिहाज़ा जिस तरफ रुई कम है उस तरफ से सिहरन बढ़ जाती है | हल्का सा सर बाहर निकालता हूँ तो तैरते हुए बादल दीखते हैं; कोहरा है ये जो रिस रहा है धरती की छाती पर | छूहे की खूँटी पर टंगी लालटेन अब भी जल रही है...हौले हौले | अम्मा देखेंगी तो गुस्सा होंगी; मिटटी का तेल जो नहीं मिल पाता है गाँव में....दो घंटों तक खड़ा रहा था कल, तब जाकर तीन लीटर…

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Added by neeraj tripathi on April 21, 2011 at 1:00pm — 2 Comments

अब अपनी पहचान लिखूंगा

बहुत लिख चुका मरण यहाँ मैं, अब मैं अमृतपान लिखूंगा,

जाने क्या समझे थे मुझको, अब अपनी पहचान लिखूंगा ;

क्यों शोक करें, उल्लास भी जब इतने सस्ते में मिलता है,

एक देह की दुनिया है ये, फिर तू क्यों आहें भरता है,

सूरज रोज़ सुबह उगता और सांझ ढले ढल जाता है,

पर उसको जो कुछ करना वह इसी बीच कर जाता है,

संकल्पों के अडिग ह्रदय पर,सावित्री का मान लिखूंगा,

मृत्यु जहाँ आकर के लौटी, ऐसा सत्यवान लिखूंगा ;



क्या मुझसे तुम लिए कभी और क्या मुझको दे जाओगे,

पर जब भी… Continue

Added by neeraj tripathi on April 19, 2011 at 12:03pm — No Comments

गलतफहमियों के लिए

किसी को कानों से सुनना,
और उस पर अमल कर जाना,
क्या ज़रूरी है !!
क्योंकि पूरे चाँद में भी,
रात की सच्चाई,
ज़रा अधूरी है...
मुझे महाभारत का,
वह कथन याद आया,
कि "अश्वत्थामा मारा गया "
ग़लतफ़हमी का शिकार,
वह कथन
द्रोण को खा गया
और हकीकत जानने से पहले ही,
एक महारथी,
काल को भा गया ,
कभी कभी भरोसा करना,
हमारी आवश्यकता नहीं,
मजबूरी है;
और गलतफहमियों के लिए भी,
थोड़ी पहचान ज़रूरी है

Added by neeraj tripathi on April 16, 2011 at 4:46pm — 4 Comments

अधेड़

कोई भरी जवानी में भी,

दिल को नहीं भाता है,

कोई अधेड़ कह कर भी,

उमंगें छोड़ जाता है,



उम्र, खुद ही,

अपने मायने तलाश रही है,

अधेड़ कह कर,

अपने ही दिलों में,

तसल्ली के राग,

गा रही है,



ये संस्कार हैं हमारे,

या सामाजिक बंधन,

कि अपने ही कान,

अपने ही दिल को,

नहीं सुनते...

पर लाख कोशिशों,

के बावजूद,

क्या आप अब भी,

सपने नहीं बुनते.....



और जैसा मैंने पहले भी,

कहा है,

पतझड़ के आने… Continue

Added by neeraj tripathi on April 7, 2011 at 11:35am — 2 Comments

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