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मेरे गाँव के जाड़े की रात

सब कुछ शांत है...मौन | दो छूहों पर टिकी छप्पर वाली दालान में रजाई ओढ़े हुए मैं इस सन्नाटे की आवाज़ सुनने की कोशिश करता हूँ | इस रजाई की रुई एक तरफ को खिसक गयी है; लिहाज़ा जिस तरफ रुई कम है उस तरफ से सिहरन बढ़ जाती है | हल्का सा सर बाहर निकालता हूँ तो तैरते हुए बादल दीखते हैं; कोहरा है ये जो रिस रहा है धरती की छाती पर | छूहे की खूँटी पर टंगी लालटेन अब भी जल रही है...हौले हौले | अम्मा देखेंगी तो गुस्सा होंगी; मिटटी का तेल जो नहीं मिल पाता है गाँव में....दो घंटों तक खड़ा रहा था कल, तब जाकर तीन लीटर तेल मिल पाया था | मुझे याद है बचपन में पिताजी हमेशा गाँव आने के समय मिटटी का तेल साथ लाते थे; तब मैं हँसता था | माँ डांटा करती; गाँव में तुम्हारी अम्मा को तेल नहीं मिल पाता, इसलिए ले जाते हैं यहाँ से, पर लालटेन इन सब बातों से बेखबर इस जाड़े में अब भी जल रही है...और मिटटी का तेल हलके काले धुंए की शक्ल में कोहरे से मिलता जा रहा है |

मैं उठकर लालटेन बुझा देता हूँ, ज़रा भी आत्मीयता के बगैर; जैसे रात में दो घंटे उस की रोशनी में किताब पढना मेरा हक़ था, मेरी ज़रूरत नहीं | थोड़ी ही दूर खटिया पर अम्मा लेटी हैं; तीन कथरियाँ ओढ़े हुए...या शायद चार | सत्तर बरस की ये महिला मेरी माँ की बड़ी बहिन है और मेरे पिताजी की भौजी भी; इक्कीस की अवस्था में विधवा हुई अम्मा ने न जाने ऐसी कितनी ही रातें देखी हैं...उनके लिए ये एक और रात के अलावा कुछ नहीं |


अचानक सियार बोलने लगते हैं...हुक्की हुआन, हुक्की हुआन ! गर्मियों में ये सारी रात बोलते हैं पर जाड़ों में अक्सर ये बिलों में घुसे रहते हैं | पुराने इनारे (कुआं) के पास के बाग़ में ये बांसों की कोठ में रहते हैं; ऐसा भ्रम मुझे सदा रहा क्योंकि आवाजें वहीँ से आती हैं | रोज़ शाम को इस इनारे से एक बाल्टी पानी घर में आता था क्योंकि और कहीं के पानी से दाल नहीं पकती, अब फिर से सन्नाटा है ...

कोने में मोतिया भी दुबका पड़ा है; ऐसे कितने ही कुकुर मैंने इस घर में आते जाते देखे हैं | रात को खाने के समय मोतिया बिलकुल पास बैठ जाता था...लगभग चौके में ही; पर अम्मा कुछ नहीं कहती, न उसे भगाती न पुचकारती; और यदि मैं दुत्कार देता तो भी कुछ नहीं बोलती | उन्हें पता है की मोतिया कहीं नहीं जाएगा...ये उनके साथी हैं; उनके अकेलेपन के | मुझे कभी कभी लगता है कि अम्मा ज़रूर उससे लिपट कर रोती होंगी | अचानक पट्टीदार के घर से भौंकने की आवाज़ आती है; मोतिया तुरंत उठता है और सरपट भाग निकलता है आवाज़ की ओर | गाँव के सभी कुत्तों में घनिष्ट एकता है...गाँव के लोगों के विपरीत, भौंकने की आवाजें बढ़ गयी हैं, पर अम्मा अब भी बेफिक्र मुहं ढक कर सोयी हुई हैं | पड़ोस का बूढ़ा पहलवान ज़ोर से लाठी ज़मीन पर पटकता है और गरियाता है; तोहरी माई की........और भौंकना आश्चर्यजनक रूप से बंद हो जाता है | सभी कुत्ते गालियों को समझते हैं यहाँ |

मोतिया वापस आ गया है, अपनी जगह पर जाड़े से लड़ने के लिए, जाड़े से लड़ना मुझे अच्छा लगता है; कोने में दुबकी बिल्ली, पेट में मुहं छुपाये कुत्ता, सिकुड़ी सिमटी नारी, या पुरुष कोटधारी; जब भी कोई जाड़े से लड़ता है, मुझे अच्छा लगता है | कोहरा अब भी रिस रहा है; और सुबह जब हम अपने शरीर को फैलायेंगे तो इस कोहरे को अपलक देखते रहेंगे, कैसे इकट्ठा होता रहा ये रात भर जब हमने अपने शरीर उन कथरियों में सिकोड़ रखे थे | अब फिर सब मौन है...न सियार बोल रहे हैं न ही कुत्ते भौंकते हैं | एक रात और सरक रही है अहिस्ता से इन खेतों पर, इनके मेड़ों पर, इन बागों से, इनारों से होते हुए, खलिहानों से, इन लोगों के घरों से और उनमे लटकी लालटेनों से |

ये मेरे गाँव की जाड़े की एक रात है; ठंडी और लिसलिसी, इसमें जीवन सोता है, पर चलता रहता है.....

-------मेरे एक संस्मरण से ...

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Comment by neeraj tripathi on April 26, 2011 at 10:04am
dhanyavaad bagiji aur vandana ji

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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 21, 2011 at 8:46pm
नीरज जी, संस्मरण अच्छे लगे, खास कर आंचलिक शब्दों का प्रयोग जैसे इनार , कथरी, छुहा , पट्टीदार आदि , सुंदर शैली , आभार |

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