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सतविन्द्र कुमार राणा's Blog – March 2017 Archive (3)

तरही गजल

2122 2122 212



बस झुके हमको तो सबके सर मिले

बुत यहाँ भारी ज़माने पर मिले



काँच के जिनके बनें हैं घर यहाँ

हाथ में उनके ही बस पत्थर मिले।



विष गले में रख सके जग का सकल

है कहाँ मुमकिन कि फिर शंकर मिले।



दिल में उनके है धुआँ गम का बहुत

पर मिले जिससे भी वो हँसकर मिले



फूल को कैसे समझ लें फूल जब

पास उसके ही हमें खंजर मिले



मिल गया अब रहनुमा देखो नया

झोपड़ी को भी नया छप्पर मिले



हैं जहाँ पर दौलतों की… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on March 21, 2017 at 9:00pm — 12 Comments

ज़ुबाँ पे सख्त पहरा हो रहा है(गजल)/सतविन्द्र कुमार राणा

1222 1222 122
बिखरकर फिर इकट्ठा हो रहा है
जवाँ फिर से इरादा हो रहा है।

जिसे अपना समझते थे,न जाने
वही क्यों अब पराया हो रहा है?

समन्दर सी छलकती हैं ये आँखें
कोई तो ज़ख्म गहरा हो रहा है।

किसे जाकर सुनाएँ हाल अपना
हमारा शाह बहरा हो रहा है।

भरोसा टूटना लाज़िम हुआ अब
जहाँ का दौर झूठा हो रहा है।

ज़ुबाँ कैसे किसी की अब उठेगी
ज़ुबाँ पे सख़्त पहरा हो रहा है।

मौलिक/अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on March 16, 2017 at 10:11pm — 12 Comments

आदमी को आदमी ही अब समझ ले आदमी (गजल)/सतविन्द्र कुमार राणा

2122 2122 2122.212

प्यार के अहसास को दिल की चुभन तक ले चलो

नफरतों को भूलकर फिर से मिलन तक ले चलो।



आदमी को आदमी ही अब समझ ले आदमी

आदमीयत को जमाने के चलन तक ले चलो



बन नहीं सकती अगर सरकार खुद के जोर से

साथ लेकर औरों को इसके गठन तक ले चलो



भूख से तड़पे न कोई ठण्ड से काँपे नहीं

रोटी कपड़ा हर किसी के अब बदन तक ले चलो



छोड़ कर जिसको हूँ आया चन्द सिक्कों के लिए

याद आता है मुझे,मेरे वतन तक ले चलो



छोड़ना तन को था मुश्किल… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on March 10, 2017 at 9:30pm — 14 Comments

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