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Ajay sharma's Blog – March 2015 Archive (1)

मैं अज़ीज़ सबका था , ज़रूरत पे , मगर..........

बद -गुमानी थी मुझे क़िस्मत पे , मगर

मैं अज़ीज़ सबका था , ज़रूरत पे , मगर

हज़ार बार मुझे टोंका उसने , सलाह दी ,

ख़याल आया मुझे उसका , ठोकर पे , मगर

सुबह से हो गयी शाम और अब रात भी

पैर हैं कि थकने का , नाम नहीं लेते , मगर

वो खरीददार है , कोई क़ीमत भी दे सकता है

अभी आया है कहाँ , वो मेरी चौखट पे , मगर



करो गुस्सा या कि नाराज़ हो जायो "अजय"

सितम जो भी करो , करो खुद पे , मगर

अजय कुमार…

Continue

Added by ajay sharma on March 10, 2015 at 11:59pm — 9 Comments

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