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AVINASH S BAGDE's Blog – February 2012 Archive (6)

लघुकथा--हेलमेट.

सरकार ने सख्ती दिखाई.फिर से हेलमेट की दुकानें सज गई.गोविन्द ने भी कुछ पैसे जमाये और एक हेलमेट की दुकान सड़क के किनारे खोलकर बैठ गया. धंधा चल निकला.लोगों के सरों की हिफाज़त के सरकारी फरमान के चलते गोविन्द और उस जैसे कई बेरोजगारों को काम मिल गया. तभी एक दिन दोपहर के वक़्त एक अनियंत्रित ट्रक गोविन्द की दुकान पर चढ़ गया. तमाम हेलमेट सड़क पर इधर-उधर बिखर गए. पुलिस वाले उन्ही हेलमेटों के बीच गोविन्द के धड से अलग हुये सिर की तलाश कर रहे थे..

....... अविनाश बागडे.

Added by AVINASH S BAGDE on February 23, 2012 at 10:00am — 5 Comments

चमत्कार बेच के...

राह में खड़े हो यूँ घर-बार बेच के,

अपना बसा-बसाया ये संसार बेच के.
किसने तुम्हे सताया के करते हो ख़ुदकुशी,
लड़  रहे हो म्यान से,  तलवार बेच के!
बख्शेंगी तुम्हे क्यों ये समंदर की मछलियाँ!
खे   रहे  हो   नाव  यूँ  पतवार   बेच   के.
कैसी रवायतें   हैं ये  कैसा   समाज है?
दुल्हन खड़ी है हाट  में सिंगार बेच के!!
आवाज़ तेरी गूँज के रह जाएगी यहाँ,
तू फिरेगा यूँ तेरे अधिकार बेच…
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Added by AVINASH S BAGDE on February 15, 2012 at 11:00am — 4 Comments

पाँच हाइकू

 दिल लगाया.

वादे बहुत किये.

मोल चुकाया! 

*

बाज,बाज है.

गिद्ध, ' दृष्टि' रखता.

चालबाज है.

*

अजगर भी.

बैठ-बैठ के खाते.

अफसर भी! 

*

रंग-बिरंगी.

गलियाँ जीवन की.

बड़ी बेढंगी!

*

खून खौलता.

मुट्ठियाँ भींच जाती.

मुख बोलता.

*

अविनाश बागडे.

Added by AVINASH S BAGDE on February 11, 2012 at 10:30am — 8 Comments

छन्न पकैया

छन्न पकैया-छन्न पकैया, जीवन तेरा- मेरा.

रोज डूबता सूरज इसमे, होता रोज सबेरा.

**

छन्न पकैया-छन्न पकैया, सांसें आती-जाती.

चलने का मतलब है जीवन,रुकना मौत कहाती.

**

छन्न पकैया-छन्न पकैया, सुख ही दुःख का कारण.

इस धरती पर कोई घटना , होती नही अकारण.

**

छन्न पकैया-छन्न पकैया, कह गए ज्ञानी-ध्यानी.

अपना ही गुण-धर्म निभाते, हवा,आग और पानी.

**

छन्न पकैया-छन्न पकैया, धर्म वही है सच्चा.

जिसे जानता वसुंधरा का, साधो, बच्चा-बच्चा.…

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Added by AVINASH S BAGDE on February 6, 2012 at 8:00pm — 5 Comments

तीन कुंडलियां / अविनाश बागडे

(१)

शक्तिशाली खूब बनो,साहस हो भरपूर.

विनम्रता के भाव ही,मन में रहे प्रचूर.

मन में रहे प्रचूर ,सादगी का गहना हो.

अपनी जरुरत की सरहद में ही रहना हो.

कहता है अविनाश,बढ़ेगी तब खुशहाली.

जीवन अपना और बनेगा शक्तिशाली.

(२)

भाई से भाई टकरा के होते है बरबाद.

दुश्मन के सारे मंसूबे हो जाते आबाद.

हो जाते आबाद,सभी तुम पर हंसते है.

टूटा घर दिखलाकर सब फिकरे कसते हैं.

कहता है अविनाश रोकिये जगत हंसाई

घर का झगडा घर में…

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Added by AVINASH S BAGDE on February 5, 2012 at 1:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल...

ग़ज़ल...

पीले हुए हैं हाँथ जब से मेरे लाल  के,
आये समझ में भाव उसको आटे- दाल  के.
##
आना तू पूछने को जरा इंतजाम से,
दूंगा जवाब मै तुम्हारे हर सवाल के.
##
होते है ऐसे लोग भी अपने समाज में,
मारते हैं मखमली जूते निकाल  के.
##
हमको किसी सय्याद की बातों का डर नहीं,
पंछी चहकते हम सभी हैं एक डाल के.
##
कपड़ों…
Continue

Added by AVINASH S BAGDE on February 2, 2012 at 4:30pm — 5 Comments

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