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Dr. Vijai Shanker's Blog – February 2015 Archive (11)

शेरों की दुनियाँ---डा० विजय शंकर

शेरों की दुनियाँ अजीब ,

जमाना अजीब होता है,

हर शेर अज़ब होता है,

हर शेर गज़ब होता है,

शेर सवाल, शेर जवाब होता है

शेर का जवाब भी शेर होता है

शेर पर शेर , सवा सेर होता है |



हमको भी शौक चर्राया,

हम भी आ गए शेरों के बीच ,

अपने चूहे बिल्ली लेकर ,

उन्होंने वो हंगमा बरपाया

कि शेर शेर घबड़ाया , बोला ,

अरे ,ये कौन शेर के जंगल में चला आया |



शेरों की अपनी एक तहजीब होती है ,

एक अदब , एक तमीज होती है ,

क़यामत होती है , एक… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 25, 2015 at 10:55am — 24 Comments

कौन सा साहित्य रचते हो ( 2 )--डॉo विजय शंकर

भरा पड़ा है साहित्य ,

ऐसा साहित्य जो,

कभी जुड़ नहीं पाया लोगों से ,

आम आदमी से , सीमित रह गया एक

अत्यंत सूक्ष्म तथाकथित उच्च सभ्रांत वर्ग में |

वेद , गीता , पुराण , भरा-बिखरा पड़ा है ज्ञान ही ज्ञान ,

मिल जाएगा , ढेरों मिल जाएगा , इनसे , उनसे ,

ऋचाओं से , श्रुतियों से , स्मृतियों से , संहिताओं से ,

बस , जुड़ नहीं पाया कभी दाल रोटी की समस्याओं से |

वह सर्वस्व है , वह यहां है , वहां है ,

अन्न अन्न के दाने दाने में है , सर्वत्र है वह ,

वह… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 23, 2015 at 10:08am — 14 Comments

कौन सा साहित्य रचते हो (1)--डॉo विजय शंकर

क्या करते हो,

कौन सा साहित्य रचते हो,

क्यों रचते हो ,

किसके लिए रचते हो ?

स्वान्तः सुखाय ,

कोई पढ़ता है ,

ऐसा लिख देते हो ,

अर्थ ढूंढना पड़ता है ,

जो है ही नहीं वो

निकालना पड़ता है ,

गाय है , घास है,

गाय घास खा चुकी ,

गाय जा चुकी ,

अब कुछ नहीं ,

सब अदृश्य है, पर है ,

समझ से परे है, पर है ,

क्योंकि लिखा है तुमने ,

जिनको दिख जाए , चक्षुवान।

बाकी ,

बाकी के लिए कहाँ लिखते हो तुम ,

तुम तो अपने लिए… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 22, 2015 at 9:52am — 17 Comments

आज़ादी --- डॉ o विजय शंकर

उड़ता वो आज़ाद परिंदा

नभ छू लेने की कोशिश

करता है,

ऊंचा , ऊंचा उड़ता है |

बीच बीच में धरती छूने ,

लौट , लौट कर आता है ,

कुछ चुंगता है, कुछ खाता है,

इठलाता है, कुछ गाता है ,

फिर , फुर्र से उड़ जाता है ,

दूर, बहुत दूर , ओझल हो ,

क्षितिज तरफ वो जाता है ,

क्षितिज तरफ वो जाता है ||

यूँ आते - जाते हमको वो

अपने हौसले दिखलाता है ,

और हमको यह बतलाता है,

हौसलों से क्या नहीं हो जाता है,

हौसलों से क्या नहीं हो जाता है… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 18, 2015 at 1:32pm — 25 Comments

आज़ाद कोई नहीं , सब डोर से बंधे हैं --- डॉ o विजय शंकर

बंधे सब डोरियों से हैं,

ये अलग बात है कि

किसकी डोर , मूलतः , किसके हाथ है ।

कोई अपनी डोरी में बस थोड़ी सी ढील चाहता है,

अपने साथ वाले की डोर बस थोड़ी टाइट चाहता है ।

किसी की खींच ली गई , किसी को ढील मिल रही है ,

किसी की फंस गई है , उनकी फंसी थी,निकल गई है ।

अब किसी को क्या कहें , जिस के हाथ अपनी डोर है ,

वही उसे दबाए बैठा है ।



चाहतें ऐसी ऐसी , उसकी डोर मेरे हाथ आ जाए ,

मेरी डोर काश यहाँ से छूटे , उसके पास पहुँच जाए

उनके तो हाल ही… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 15, 2015 at 11:25am — 8 Comments

वैलेंटाइन डे

जिंदगी को सब प्यार करते है ,

इसलिए नहीं कि वह हमें जीने का मौक़ा देती है ,

बल्कि इसलिए कि वह हमें प्यार से जीने का मौक़ा देती है,

प्यार करने , प्यार बांटने और प्यार में रहने का मौक़ा देती है ,

प्यार है तो जिंदगी में कोई बोझ बोझ नहीं है ,

प्यार नहीं है तो जिंदगी से बड़ा कोई बोझ नहीं है ,

हम जिंदगी के लिए जीना नहीं चाहते हैं ,

हम प्यार के लिए जीना चाहते हैं,

हम प्यार के लिए जिंदगी चाहते है ,

इसीलिये हम सब जिंदगी को प्यार करते है .



हैपी… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 14, 2015 at 1:30am — 20 Comments

प्रकृति में सुकून---डॉ o विजय शंकर

प्रकृति प्रेमी है वह ,

प्रकृति से असीम प्रेम करता है,

पहाड़ों पर, समुद्र-तटों पर, जंगलों में, रेगिस्तान में ,

कहाँ नहीं जाता है वह , कई कई दिन ,

कई कई रातें बिताता है ,

प्रकृति की गोद में ही सुख पाता है ,

वहीं खो जाता है वह ।

बस प्रकृति की सर्वोत्त्तम कृति से डरता ,

बहुत घबड़ाता है ,

उनसे कुछ दूर ही रहता है वह ,

सर्वोत्तम कृति की प्रकृति , समझ ही नहीं पाता है वह ,

उनकी उष्णता , उदासीनता , विद्वता , कुछ समझ नहीं पाता ,

उनके बीच तो जैसे… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 11, 2015 at 9:17pm — 20 Comments

कुर्सी को जानों -----डॉ o विजय शंकर

कुर्सी को जानों

कुर्सी को पहचानों ,

कुर्सी है तो जीवन है, जान है.

कुर्सी है तो भोंडापन भी ज्ञान है ,

अन्यथा क्या ज्ञान है, क्या विज्ञान है ,

डिग्रियों के लिए कूड़ेदान है।

कुर्सी है तो आस है ,

अपना चतुर्दिश विकास है |



तख़्त उलटते रहे होंगें ,

सिंहासन डोलते रहे होंगें ,

कुर्सी न उलटती है, न डोलती है ,

न उसे कोई ऐसा ख़तरा होता है ,

हाँ , कुर्सी पर जो बैठा हो

वो औरों के लिए जरूर ख़तरा होता है |

कोई कहता है ताक़त बन्दूक से… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 9, 2015 at 11:37am — 17 Comments

अपनी पीठ थपथपाना ---डॉo विजय शंकर

कठिन है

बहुत ही कठिन है

हाथ पीछे कर अपनी ही पीठ थपथपाना,

लेकिन....

कुछ लोग थपथपा लेते हैं,

बार बार थपथपाते हैं ,

लगातार थपथपाते हैं ,

खुद, खुश भी हो लेते हैं,

किन्तु भूल जाते हैं कि...

हाथ का प्रयोजन केवल यही नहीं है,

जिंदगी बीत जाती है,

किन्तु नहीं जान पाते,

और न ही कर पाते हैं

हाथों का सही इस्तेमाल,

बस अपनी पीठ थपथपा

खुश होते जाते हैं |

कभी कभी तो सौगातें आती हैं,

और सामने से निकल जाती है,

किन्तु, उनकें… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 6, 2015 at 11:00am — 19 Comments

कोई मुझे नेता बना दे---डॉo विजय शंकर

काश कोई मुझे नेता बना दे ,

अपने हाथों से उठाये

और भीड़ में गिरा दे |

फिर देखना , कैसे उठता हूँ मैं ,

हाय कोई एक बार तो गिरा दे ,

कोई तो मुझे नेता बना दे |

मेरा प्रोफाइल देख ले,

रिज्यूमे भेज देता हूँ ,

फोटो भी लगा देता हूँ,

क्या-क्या किया है , बता देता हूँ ,

ऐसा क्या है , मैं कर नहीं सकता ,

लोग हैरत में आ जायेंगें ,

जो कर के दिखा सकता हूँ |

बस एक बार , एक बार ,

मुझे उठाओ , एक बार मुझे उछालो ,

फिर देखना , क्या क्या… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 4, 2015 at 10:05am — 17 Comments

मुद्दा भुनाने के लिए होता है--- डॉo विजय शंकर

बात करना , खूब बात करना ,

मुद्दे की बात कभी मत करना ,

मुद्दे की बात करोगे ,

अकेले रह जाओगे ,

फिर कहाँ जाओगे ,

लौट के ( बुद्धू ) फिर वहीँ आओगे।



मुद्दे के आस- पास रहना ,

उसके पास ही नाचना ,

वहीँ गाना , वहीँ बजाना ,

जब - जब मौक़ा मिले ,

मुद्दे को भुनाना , बस .

मुद्दे को खुद कभी नहीं उठाना ,

वरना खुद उठ जाओगे ,

मुद्दे को फिर भी वहीँ पाओगे।



मुद्दा भुनाने के लिए होता है,

निपटाने के लिए नहीं होता है |

जो थोड़ा… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 1, 2015 at 11:55am — 14 Comments

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