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बृजेश कुमार 'ब्रज''s Blog – February 2017 Archive (3)

ग़ज़ल...आँसू तभी छलक पड़े बेबस किसान के

221 2121 1221 212
.
ये बेरुखी ये ज़ुल्म सितम आसमान के
आँसू तभी छलक पड़े बेबस किसान के

दिल में छुपा लिये थे सभी गम जहान के
रुख पे नुमायाँ हो गए लम्हे थकान के

वीरां है मुददतों से मगर टूटता नहीं
ये हौंसले तो देखिये जर्जर मकान के

है मजहबी अलाव, सुलगते सभी बशर
बदहाल गाँव घर हुए भारत महान के

वो अनमनी सबा, हुआ रंजूर ये चमन
निकली लवों से आह किसी बेजुबान के
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 26, 2017 at 9:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल....मुहब्बत आह भरती है इबादत हार जाती है

1222 1222 1222 1222

सदा पत्थर से टकरा कर मेरी बेकार जाती है

मुहब्बत आह भरती है इबादत हार जाती है



हमारे दर्द के किस्से बराए आम हैं कब से

तुम्हारे आसरों तक भी कुई चीत्कार जाती है ?



अज़ब सी बहशतों में आजकल डूबा हुआ है दिल

सँभालूँ जो मैं दरवाजा दरक दीवार जाती है



जरा सा रोक लो ये गम जरा सीं राहतें दे दो

मुसलसल बेरुखी भी अब ह्रदय के पार जाती है



तुम्हें भी इल्म हो जायेगा तुम भी जान जाओगे

क्षितिज के पार सच्चे इश्क़ की झनकार जाती… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 14, 2017 at 5:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल...गम जहाँ के पहलू में दो चार आ कर बैठ गए

फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन

2122 2122 2122 212

गम जहाँ के पहलु में दो चार आ कर रुक गये

हम उसी दोराहे पे तब सकपका कर रुक गये



रहगुज़र तपती हुई होती बसर भी कब तलक

दर्द था इफरात में वो छटपटा कर रुक गये



ये अदा भी खूब है उस संगदिल महबूब की

बिन बताये दिल में आये मुस्कुरा कर रुक गये



ज़ुस्तज़ू दीदार की होती मुकम्मल किस तरह

वो अदा से ओढ़ कर घूँघट लजा कर रुक गये



है फ़ज़ाओं में खबर गुजरेंगे वो इस राह से

मोड़ पर हम सर झुका आँखें… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 3, 2017 at 8:30pm — 26 Comments

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