ग़ज़ल
2122 2122 212
कितने काँटे कितने कंकर हो गये
हर गली जैसे सुख़नवर हो गये
रास्तों पर तीरगी है आज भी
शह्र-से जब गाँव के घर हो गये
आत्मनिर्भर हो रहे थे ही कि वे
हुक्म आया घर से बेघर हो गये
जो गिरी तो साख गिरती ही गई
अच्छे खासे नोट चिल्लर हो गये
सहमी-सहमी हर कली खिलती है अब
यूँ बड़े भँवरों के लश्कर हो…
ContinueAdded by Ashok Kumar Raktale on January 8, 2026 at 5:00pm — 5 Comments
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