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March 2010 Blog Posts

यह अमर निशानी किसकी है? ( माखनलाल चतुर्वेदी)

यह अमर निशानी किसकी है?

बाहर से जी, जी से बाहर-

तक, आनी-जानी किसकी है?

दिल से, आँखों से, गालों तक-

यह तरल कहानी किसकी है?

यह अमर निशानी किसकी है?



रोते-रोते भी आँखें मुँद-

जाएँ, सूरत दिख जाती है,

मेरे आँसू में मुसक मिलाने

की नादानी किसकी है?

यह अमर निशानी किसकी है?



सूखी अस्थि, रक्त भी सूखा

सूखे दृग के झरने

तो भी जीवन हरा ! कहो

मधु भरी जवानी किसकी है?

यह अमर निशानी किसकी…
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Added by Admin on March 14, 2010 at 8:50am — 2 Comments

गरीबी..

इक कमरे का है ये मकाँ...


यहाँ आदमियों की जगह नहीं,


खाने को दो दिनों की भूख है


पीने को रिस-रिसकर बहता पानी


बेरंग सी दीवारों की मुन्तज़िरी,


औ छत की रोती सी दीवारें


गोशों में…
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Added by विवेक मिश्र on March 12, 2010 at 12:00am — 6 Comments

ज़िन्दगी की किताब से (रजनी छाबरा)

ज़िन्दगी की किताब से

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ज़िन्दगी की किताब से

फट जाता है जब

कोई अहम पना

अधूरी रह जाती है

जीने की तमन्ना

कभी कभी बागबान से

हो जाती है नादानी

तोड़ देता है ऐसे फूल को

जिसके टूटने से

सिर्फ शाख ही नहीं

छा जाती है

सारे चमन में वीरानी

रह जाता है मुरझाया पौधा

सीने में छुपाये

दर्द की कहानी

जिस पौध को पानी की बजाए

सींचना पड़ता हो

अश्कों ओर नए खून से

उस दर्द के पौधे का

अंजाम क्या… Continue

Added by Admin on March 11, 2010 at 10:30pm — 6 Comments


मुख्य प्रबंधक
साधु बन बोले राम राम

जिन्दगी आधी बीत गई,

कभी न किया धर्म का काम,

पूलिस पिछे जब पड़ी तो,

साधु बन बोले राम राम,



लूट मार, चोरी डकैती,

किये बहुत कुकर्म मे नाम,

सभी पाप छिप गया,

जनता पूजे अब सुबह शाम,



जनता पूजे सुबह शाम,

अब मजा ही मजा है,

पहले पुलिस से छुप के,

करना पड़ता था गन्दा काम,

अब नेता पुलिस करते रखवाली,

खुब है ऐशोआराम,



खुब है ऐशोआराम,

आप भी बाबा के बन…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 11, 2010 at 7:00am — 1 Comment

का पूछातानी सम्राट जी ?

लोटे बिन चलता नहीं किसका जग में काम!

जिस पशु को माता कहे उसका क्या है नाम !!

उसका क्या ही नाम क्योन पशु मिमियाता है !

भुन्का करता क्योन,क्योन पच्छी गाता है !!

पूछे सम्राट जी ,मिले क्या सिक्के खोटे!

क्या पानी या ढूध,भरा करते है लोटे !!









सोते जागते जिव सब ,क्या लेते है चीज !

धोकर क्या तुम पहनते ,चड्ढी ,पैंट कमीज !!

चड्ढी पैंट कमीज ,साफ क्या पहनो टाई!

मलिन कपडे जब धरो ,मीत क्या करे खिचाई !

पूछे सम्राट जी ,बिना कारन क्या रोते… Continue

Added by santosh samrat on March 10, 2010 at 10:24am — 5 Comments


मुख्य प्रबंधक
मेरी नादानी

मेरी पहली कविता जो मैने १९९६ मे लिखी थी  .....





भूली मुहब्बत की दास्तान हो तुम ,
जहाँ सूरज चाँद सितारे न हो…
Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 9, 2010 at 9:00am — 1 Comment

जिन्दगी ,By Guru Jee

जिन्दगी ,
इस उम्र की इस पराव पर ,
मुझे अब लगाने लगा हैं ,
जिन्दगी एक खुबसूरत ख्वाब हैं ,
और मैं इस ख्वाब को ,
खूबसूरती से जीना चाहता हूँ ,
जिन्दगी ,
इसी का नाम हैं ,
जो जीने के लिए ,
उत्साहित करे ,
औरो के लिए ,
कुछ करने की तमन्ना हो ,
जिन्दगी ,
दोस्तों की दोस्ती ,
अपनो की अपनापन ,
दुस्मानो से सिख ,
गैरो से मुहबत ,
समझ जिन्दगी की ,
इस उम्र की इस पराव पर ,

Added by Rash Bihari Ravi on March 8, 2010 at 7:46pm — 3 Comments

अग्नि परीक्षा ( हरिवंशराय बच्चन )

यह मानव की अग्नि-परीक्षा।



बढ़ती हैं लपटें भयकारी

अगणित अग्नि-सर्प-सी बन-बन,

गरुड़ व्यूह से धँसकर इनमें

इनका कर स्वीकार निमंत्रण;

देख व्यर्थ मत जाने पाये विगत युगों की शीक्षा-दीक्षा।

यह मानव की अग्नि-परीक्षा।



सच है, राख बहुत कुछ होगा

जिस पर मोहित है तेरा मन,

किंतु बचेगा जो कुछ, होगा

सत्य और शिव, सुंदर कंचन;

किंतु अभी तो लड़ ज्वाला से, व्यर्थ अभी अज्ञात-समीक्षा।

यह मानव की अग्नि-परीक्षा।



खड़े स्वर्ग में बुद्ध,… Continue

Added by Admin on March 7, 2010 at 9:29pm — 2 Comments

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