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Nilesh Shevgaonkar commented on dileepvishwakarma's blog post ग़ज़ल
"दर्द ओ इजतराब जैसा हूं,,,, यहाँ ओ का भार या 1 होगा या 0...1 हुआ तो दर्दो हो जाएगा.. 0 हुआ तो दर्द -इज़्तिराब ,,दोनों सूरत में मिसरा बेबहर है ..ग़मो की इक किताब जैसा हूं.... गमों (१-२) फिर  बहर नदारद है ..मैं झुलसता गुलाब जैसा हूं...झुलसते आएगा…"
Jun 20, 2016
Ravi Shukla commented on dileepvishwakarma's blog post ग़ज़ल
"आदरनीय दिलीप जी आपकी गजल से पहली बार गुजरना हो रहा है , बहुत अच्छी गज़ल हुई है , दिल से बधाइयाँ आपको ।"
Jun 16, 2016
dileepvishwakarma commented on dileepvishwakarma's blog post ग़ज़ल
"जी आदरणीय गिरिराज जी सही सुझाव है आपका आभारी हु"
Jun 15, 2016

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on dileepvishwakarma's blog post ग़ज़ल
"आदरनीय दिलीप भाई , बहुत अच्छी गज़ल हुई है , दिल से बधाइयाँ आपको । धूप का इक लिबास है तन पर और मैं आफताब जैसा हूं      --    बहुत बढिया ।  इसे अगर यूँ कहें तो - एक गैर ज़रूरी सलाह समझियेगा धूप का बस लिबास…"
Jun 15, 2016
Shyam Narain Verma commented on dileepvishwakarma's blog post ग़ज़ल
"बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए …………….."
Jun 15, 2016
dileepvishwakarma posted a blog post

ग़ज़ल

2122_1212_22दर्द ओ इजतराब जैसा हूंग़मो की इक किताब जैसा हूंधूप का इक लिबास है तन परऔर मैं आफताब जैसा हूंखार हर हाथो में कि शाखों परमैं झुलसता गुलाब जैसा हूंकुछ न हासिल मेरी मुहब्बत कोमैं कि दरिया चनाब जैसा हूंरेत है प्यास औ मेरी आहेंबेसदा कोई खाब जैसा हूंमौलिक एवम् अप्रकाशितSee More
Jun 15, 2016

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर left a comment for dileepvishwakarma
"आपका अभिनन्दन है. ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए  ग़ज़ल की कक्षा   ग़ज़ल की बातें    भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है | | | | | | | | आप अपनी मौलिक व अप्रकाशित रचनाएँ यहाँ…"
Jun 15, 2016
dileepvishwakarma is now a member of Open Books Online
Jun 10, 2016

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Male
City State
azamgarh
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azamgarh
Profession
job
About me
thinking

Dileepvishwakarma's Blog

ग़ज़ल

2122_1212_22

दर्द ओ इजतराब जैसा हूं
ग़मो की इक किताब जैसा हूं

धूप का इक लिबास है तन पर
और मैं आफताब जैसा हूं

खार हर हाथो में कि शाखों पर
मैं झुलसता गुलाब जैसा हूं

कुछ न हासिल मेरी मुहब्बत को
मैं कि दरिया चनाब जैसा हूं

रेत है प्यास औ मेरी आहें
बेसदा कोई खाब जैसा हूं

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on June 15, 2016 at 1:46pm — 5 Comments

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At 4:06pm on June 15, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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