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 आदरणीय एडमिन

आप सभी सुधी विद्वान है I आपको साहित्य और  इतिहास का संबंध ज्ञात है  I ऐतिहासिक कहानियों , उपन्यासों और काव्यों  से इतर इतिहास के लेख भी रोचक होते है और हमें अच्छी जानकारियां  भी देते है I   इस मंच पर  राजनीति और फिल्म संबंधी लेख के लिए तो अवसर है, जो साहित्य से अधिक करीब नहीं हैं  पर इतिहास के लिये नहीं  है i मैंने सोचा कि ऐसे लेख भी दूं पर कोई उचित स्थान नहीं मिला  I

मैं समझ सकता हूँ  कि अधिकांश सदस्यों में गंभीर लेखन में कम रुचि है i वे न  लिखते है न पढ़ते है i पर मंच का उद्देश्य  तो व्यापक होना ही चाहिए i  सौरभ जी के लेख भले कोई न पढ़े पर उनका अपना महत्व  तो है आखिर यह सामग्री ही तो इस मंच  पूंजी  हैं  I

इसी प्रकार छंद के लिए स्थान है, पर काव्य-शास्त्र के लिए स्थान नहीं है i मेरे काव्य-शास्त्रीय लेख इसी स्थानाभाव के कारण  छंद चर्चा में डाले  गये i

यह मेरी कोई  शिकायत नहीं है  i एडमिन के सभी लोग मुझे जानते है i मैं भी सब को जानता हूँ i  सब एक परिवार है i हम अनुजाग्रज की डोर  में बंधे हैं i अतः यह मेरा मात्र सुझाव है i आपके हाथों  में है  i कोई बंधन नहीं है i  सादर i

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Replies to This Discussion

इस वैचारिक प्रस्तुति के लिए सादर धन्यवाद आदरणीय |

 

सादर ...............

वर्मा जी

आपका आभार i

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी, जिस विषय हेतु अलग से समूह नहीं बना है उस विषय पर आलेख ब्लॉग सेक्सन में पोस्ट किया जा सकता है उसी प्रकार ऐसे पोस्ट जिसपर चर्चा की गुंजाईश हो उसे फोरम सेक्सन के अंतर्गत पोस्ट कर सकते हैं । सादर ।

आदरणीय बागी जी \

उक्त जानकारी के लिए आभार i  सादर i

आदरणीय डॉo गोपाल नारायण जी का सुझाव विचारणीय है। संक्षेप में , हम अपने इतिहास के प्रति उदासीन ही नहीं है , अनभिज्ञ भी है। कभी-कभी किसी विद्वत मंच से अपने इतिहास की इतनी भ्रामक बातें सुनाई पड़ जाती हैं कि आश्चर्य होता है। " हम हजारों साल गुलाम थे " या " हमने सदियों गुलामी झेली है " , जैसे वाक्य जब किसी बहुपठित के मुख से सुनने को मिले तो त्रासदी ही लगती है। सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह है कि आज भी हम अपनी हर कमी , हर अकर्यमणता के लिए औपनिवेशिक शासन को उत्तरदायी ठहरा देते हैं। इतिहास को हम सजो - संभाल नहीं पाये , वर्तमान हमारे वश में नहीं हैं। जिस मानसिक गुलामी से हम कभी उबर नहीं पाये , उसकी हम कभी बात नहीं करते हैं। शायद इसलिए कि हम उससे मुक्त होना ही नहीं चाहते , बात हम शिक्षा की करते हैं पर अज्ञानता को सर्वाधिक हम ही पूजते हैं , हम अभी भी अज्ञानता को साक्षरता और शिक्षा से अधिक उपयोगी और लाभप्रद मानते हैं। बलिहारी है हमारी। विश्व में आगे वे लोग बढ़ें जिन्होंने दूसरों के लिए कुछ, बहुत कुछ किया। हम ज़रा सी भी पॉवर मिल जाये तो सात पुश्तों के लिए व्यवस्था कर लेने को ही परम लक्ष्य मानते हैं। दुनिया की समस्त आधारिक धारणाओं एवं मान्यताओं की हम अपनी स्वलाभ साधने वाली परिभाषाएं गढ़ लेते हैं। हम जब भी कुछ करते हैं, सबसे पहले छत बनाते हैं , बुनियाद और नाली को तो हम आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ देते हैं . अधिक नहीं पर ऐसा तो कभी नहीं रहा हमारा इतिहास। जागने का कोई समय नहीं होता है , दुनिया में हर पल कहीं न कहीं सूर्योदय होता रहता है , इसलिए कभी भी जागिये , पर जागिये तो।

आदरणीय विजय सर

आपके समर्थन से इस चर्चा को बल मिला है i मैं आपका आभारी हूँ  i सादर i

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