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इलाहाबाद में नवोन्मेष के तत्त्वाधान में काव्य-समारोह / दिं. 08 जनवरी 2012

साहित्य-व्योम में उन्मुक्त उड़ान भरते स्वकेन्द्रित रचनाकारों की न कभी कमी थी, न कभी कमी रहेगी. परन्तु, साहित्य के मर्म और अर्थ को जीने वाले उत्साही रचनाधर्मियों के कारण ही आज तक समाज दिशा और दशा पाता रहा है.  ऐसे ही ऊर्जस्वियों का सद्-प्रयास साहित्य के माध्यम से विधाओं की परिभाषा के गढ़े जाने का कारण रहा है.  इसी सकारात्मक प्रक्रिया के अंतर्गत साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्था ’नवोन्मेष’ के तत्वाधान में दिनांक 8 जनवरी 2012 को इलाहाबाद के वर्धा विश्वविद्यालय (महात्मा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय, इलाहाबाद प्रभाग) के प्रेक्षागृह में काव्य-समारोह का आयोजन हुआ. सन् 2009 से सिद्धार्थनगर से साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र सामाजिक रूप से दायित्त्व का निर्वहन कर रही संस्था ’नवोन्मेष’ द्वारा आयोजित इलाहाबाद महानगर में यह कोई पहला कार्यक्रम था. इससे जुड़े श्री वीनस केसरी के अथक प्रयास का ही प्रतिफल था कि इलाहाबाद परिक्षेत्र के अलावे सोनभद्र, लखनऊ, पटना और कानपुर से साहित्य प्रेमियों का सफल जुटान हुआ.  इस कार्यक्रम की सफलता हेतु युवा हस्ताक्षर वीनस केसरी द्वारा हुआ अथक प्रयास सिर्फ़ साहित्य और साहित्य के लिये हुए कर्म का सही अर्थ परिभाषित कर गया. 


गोष्ठी की अध्यक्षता ग़ज़ल की विधा और साहित्यिक परिक्षेत्र में मूर्धन्य हस्ताक्षर मोहतरम एहतराम इस्लाम द्वारा किया गया. काव्य-गोष्ठी के मुख्य अतिथि डा. ज़मीर अहसन साहब थे. गोष्ठी का शुभारम्भ गोष्ठी के अध्यक्ष तथा मुख्य अतिथि द्वारा किये गये दीप-प्रज्ज्वलन से हुआ. नवोन्मेष संस्था से जुड़े तथा सिद्धार्थनगर से आये श्री अनुराग त्रिपाठी ने सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया. उक्त अवसर पर कानपुर से पधारे श्री रविकंत पाण्डेय द्वारा सरस्वती वन्दना का सस्वर पाठ किया गया. 


इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी के सर्वसमाही संचालन में गोष्ठी में काव्य-पाठ का प्रारम्भ रमेश नाचीज़ जी द्वारा हुआ जिनके पुरअसर आवाज़ और अश’आर ने समां बाँध दिया. 


सबकुछ संभव हो सकता है ये माना लेकिन

चींटी का पर्वत चढ़ जाना माने रखता है. 

जंग किये बिन सच्चाई के रस्ते चलकर
प्रतिद्वंद्वी को धूल चटाना माने रखता है. 

इसके बाद अहमद रियाज़ रज़्ज़ाकी ने अपनी ग़ज़ल पढ़ी - 

मैं तन्हा रह गया हूँ इस सफ़र में
कोई रस्ते में छूटा है कोई घर में 

शेषधर तिवारी जी के अश’आर और ग़ज़लों ने श्रोताओं को बहुत कुछ सोचने के कई विन्दु दिये.  

न होते आँखों में आँसू तो रिश्ते जम गये होते 
न पीती माँ अगर आँसू तो कुनबे जल गये होते
या फिर, 

दोस्त हूँ मैं बात कड़वी बोल सकता हूँ कभी 
सिर्फ़ मीठे बोल सुनना है तो दुश्मन खोज लो.

इस गोष्ठी की खुसूसियत थी श्री कृष्ण मोहन मिश्र का हास्य गद्य-पाठ. उन्होंने ’चाट का ठेला’ पढ़ कर श्रोताओं को लोटपोट तो कर ही दिया चाट के चटखारे मानो शब्द से निस्सृत हो कर झर रहे थे. 

आयोजन में केन्द्रीय भूमिका निभा रहे श्री वीनस केसरी जी की ग़ज़लों ने लोगों के दिल ही नहीं दिमाग़ पर भी अपना असर डाला. कहना न होगा,  वीनस की ग़ज़लें एक विशेष तासीर की ग़ज़लें होती हैं. 


उनके द्वारा पढे गये एक मुक्तक की एक बानगी देखें -

दिन ढले जो ख्वाब लौटे हार कर
रंज मत कर बैठ मत जी मार कर 
हौसला कश्ती हुनर सब तो है
नेक बंदे अब तो दरिया पार कर  

एक माँ के नाम इस शे’र ने किसी बेटे की संभावनाओं को बखूबी उजागर किया - 

मेरी माँ आजकल खुश है इसी में 
अदब वालों में बेटा बोलता है .. 

रविकांत पाण्डेय की कविताओं ने श्रोताओं और मंचासीन अध्यक्ष और मुख्य अतिथि दोनों का समवेत ध्यान आकर्षित किया - 

हार लिखा सारी दुनिया ने मैने उसको जीत लिखा 
जब-जब अश्रु नयन में आये तब-तब मैंने गीत लिखा 


संचालन कर रहे इम्तियाज़ ग़ाज़ी ने अपनी छोटी बह्र की ग़ज़लों से सुधि श्रोताओं का खास मनोरंजन किया. 


चाँद को चाँदनी नहीं कहते 
आग को रौशनी नहीं कहते 

या फिर, 
जिसका दुश्मन नहीं कोई
उससे बच कर रहा कीजिये

ख़ाकसार (सौरभ पाण्डेय) ने शब्द-चित्रों के माध्यम से भारतीय गाँवों को जीवंत करने की कोशिश की जिसकी भरपूर सराहना मिली. आज के अनगढ़ विकास पर पढ़े गये विशेष तेवर के नव-गीत की कुछ पंक्तियाँ - 

देखो अपना खेल अजूबा, देखो अपना खेल
द्वारे बंदनवार प्रगति का पिछवाड़े धुरखेल .. भइया, देखो अपना खेल.. !

 

 

सोनभद्र से पधारे श्री अतेन्द्र कुमार रवि ने भी अपनी उपस्थिति जतायी - 

दोस्ती का हक़ तो मिंने अदा किया

जाने क्यों उसने मुझे दग़ा दिया 
 

पटना से पधारे गणेशजी बाग़ी ने हिन्दी के साथ-साथ भोजपुरी गीतों और छंदों से सभी का मन मोह लिया. 

हाँ में हाँ मिलावे जेहि बतिया बनावे जेहि

विश्वास ओकरा पर कबहुँ न करिहा ..

 

या फिर,

जनम लेवे से पहिले मार दिहलऽ बिटियन के

अब पतोहु न मिले त मन बघुआइल काहें .. . 

 

 

डा. ज़मील अहसान की ग़ज़लों की रवानी और उनकी कहन ने श्रोताओं का भरपूर ध्यान आकर्षित किया - 

यूँ बात चलेगी कि यहाँ सर न बचेगा 
पूजा के लिये भी कोई पत्थर न बचेगा 

सर बेच के तलवार बचाना है मुमकिन 
तलवार बिकेगी तो कभी सर न बचेगा 

राधा-कृष्ण को सबने देखा सूरदास की आँखों से 
फिर भी किसने सूरदास को अँधा कहना छोड़ दिया 

 
 
गोष्ठी के अध्यक्ष मोहतरम एहतराम इस्लाम के शेर और दोहों से गोष्ठी में सभी जन अभिभूत हुए. उनकी ग़ज़लों में तत्सम शब्दों के प्रयोग से एक अलग ही आयाम पैदा होता है.  

सुंदर देख  असुंदर देख 
लेकिन स्वप्न बराबर देख
दाम लगाने के पहले 
हीरा है या पत्थर देख 

दुनिया कितनी छोटी है
ऊँचाई पर जाकर देख.

   

अध्यक्ष महोदय ने वीनस के प्रयासों की भरपूर सराहना की जिसके कारण नवोन्मेष संस्था द्वारा आयोजित काव्य-गोष्ठी कई मायनों में सफल रही. सुधि श्रोताओं की संख्या ने भी कार्यक्रम को ऊँचाइयाँ बख्शीं.  काव्य पाठन के क्रम में लखनऊ से आशीष यादव तथा इलाहाबाद से  एन. लताजी तथा अजीत शर्मा आकाश की कविताओं को भी श्रोताओं से सराहना मिली. 

 

 

गोष्ठी की सफलता ने इलाहाबाद की सरज़मीं पर साहित्यिक गोष्ठियों के पुनर्जीवन हेतु संजीवनी का काम किया है इसमें संदेह नहीं है. इस अविस्मरणीय साहित्यिक शाम की आनेवाले कई-कई पल फिर-फिर से बाट जोहते रहेंगे.

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-- सौरभ 

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Replies to This Discussion

अभिनव जी, बहुत बहुत धन्यवाद

 

आदरणीय सौरभ बड़े भईया, रिपोर्ट में उत्कृष्ट रचनाकारों की चुनिन्दा रचनाओं को पढ़कर काव्य समारोह का आल्हादकारी माहौल यहाँ से महसूस हो रहा है... आपकी जीवंत रिपोर्ट अपने साथ मुझे मानो इस समारोह में ही जैसे ले गयी.... सादर आभार. साथ ही आयोजकों एवं सभी सम्माननीय रचनाधर्मी मित्रों को हार्दिक बधाईयाँ...

भाई संजय जी,  रिपोर्ट यदि जीवंत लगा तो वह उस समारोह का ही परावर्त्तन था.  कोई साधना साधन की गरिमा पर ही निर्भर करती है किन्तु साध्य अवश्य ही उद्येश्य को संतुष्ट करता हुआ हो, इसके प्रति साधकों की जागरुकता बनी रहे तो कार्य की सम्पन्नता अतिशय आह्लादकारी ही होती है. वैसे अभी बहुत दम रखना है दौड़ आयोजन करने के क्रम में.

स्वीकृति के लिये हार्दिक धन्यवाद, भाई.

 

धन्यवाद संजय जी,

संयोजन के स्तर पर मुझे जो संदेह था उन सब पर आपक सभी की शुभकामनाएं भारी पड़ीं :))) 

सौरभ जी,

इलाहाबाद में संपन्न हुई इस काव्य गोष्ठी की सफलता के बारे में आपकी रपट से पता चला. पढ़कर बहुत ही अच्छा लगा....बहुत ही अच्छी तरह प्रस्तुतीकरण किया है. आपको अनेकानेक बधाइयाँ व भविष्य में होने वाले और भी काव्य समारोहों के लिये शुभकामनायें. उन नई गोष्ठियों के बारे में भी आपकी रपटें पढ़ने का इंतज़ार रहेगा. 

 

शुभकामनाओं सहित...

शन्नोजी, आपकी सदाशयता उत्साहकारी है. आपकी प्रतिकियाओं का इंतज़ार रहता है.  अनुमोदन के लिये सादर धन्यवाद.

 

शन्नो जी,

आपकी सभी शुभकामाओं और उत्साहवर्धन से नई गोष्ठियों / सम्मेलनों और समारोहों का आयोजन होता रहेगा
आभार

वीनस जी,

जिस तरह मैंने सौरभ जी की रपट में पढ़ा कि इस काव्य गोष्ठी का बेहतरीन आयोजन आपने किया था तो इसकी सफलता के भागीदार आप भी हैं. भविष्य में होने वाले इस तरह के आयोजनों के लिये भी ओबीओ की मंडली को अनेकों शुभकामनायें. 

 

धन्यवाद

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