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आँखों देखी 8 - दक्षिण गंगोत्री में सांस्कृतिक उत्सव

आँखों देखी 8 - दक्षिण गंगोत्री में सांस्कृतिक उत्सव

शीतकालीन अंटार्कटिका के विविध रंग हमें दिख रहे थे और हम उनमें डूबते जा रहे थे. लेकिन, जैसा कि मैंने पहले कहीं कहा है, देश और परिवार से इतनी दूर रहकर अवर्णनीय कठिन परिस्थितियों का सामना करना इतना आसान नहीं था. अंटार्कटिका के इतिहास में कई ऐसे उदाहरण हैं जिनसे पता चलता है कि ऐसी विषम परिस्थितियों में रहकर अभियान दल के सदस्यों में शारीरिक समस्याओं के साथ ही मानसिक समस्याएँ भी उत्पन्न होने लगती हैं. और, ऐसी समस्याओं के दुष्प्रभाव से दल को अलग रखकर पूरे अभियान का संचालन करना ही ‘स्टेशन कमाण्डर’ (शीतकालीन दल के नेता) के लिये सबसे बड़ी चुनौती होती है. हमारे दल के स्टेशन कमाण्डर एक वरिष्ठ जीवविज्ञानी थे जिन्हें इस अभियान से पहले भी एक साल तक अंटार्कटिका स्थित एक ऑस्ट्रेलियन वैज्ञानिक शोध-केंद्र में रहकर काम करने का अनुभव था. स्वाभाविक रूप से वे शीतकालीन अंटार्कटिका और उससे सम्बंधित मानवीय व्यवहार में होने वाले सम्भाव्य परिवर्तनो से परिचित थे. उन्होंने दो महीने के अँधेरे वाली अवधि के लिये अपने अंदाज़ में सभी सदस्यों को प्रस्तुत किया था. दल में पारस्परिक दोस्ती (bonhomie) को प्राधान्य देते हुए हर एक का दूसरे को उचित सम्मान देने की ओर विशेष ध्यान दिया गया था. अति अल्प शिक्षित कारीगर से लेकर अति उच्च शिक्षित वैज्ञानिक/डॉक्टर/इंजीनियर आदि सभी स्तर के सदस्य हमारे साथी थे. भारत के उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम हर दिशा से आए हुए कम से कम आठ अलग-अलग भाषा (हिंदी व अंग्रेज़ी के अलावा) बोलने वाले चौदह सदस्यों के इस दल में छोटा सा भारत समाया हुआ था. अभियान की सफलता के पीछे एक बड़ा कारण था कि विविधता के रहते हुए भी कभी किसी की पदमर्यादा को लेकर कोई चर्चा नहीं होती थी. सभी को विश्वास था कि उसकी अपनी विशेषता ही उसे अंटार्कटिका तक ले गयी है और सबको उस राष्ट्रीय यज्ञ में समान रूप से भाग लेना है. ग्रीष्मकालीन दल को लेकर जहाज़ के वापस जाने के बाद से ही हम चौदह लोग सब काम मिलकर करते थे. स्टेशन ड्यूटी जिनकी होती थी वे ही उस ड्यूटी के अंतर्गत आने वाले काम करते थे लेकिन किसी भी समय किसी की भी सहायता ली जा सकती थी. जो हमारे लिये खाना बनाते थे उन्हें सप्ताह में एक दिन पूर्ण विश्राम का अवसर दिया जाता था. उस दिन पूरे स्टेशन के लिये खाना बनाने का दायित्व दो सदस्यों पर होता था और बारी-बारी से सभी को यह काम करना होता था. इसका नतीजा यह हुआ कि जिन्हें खाना बनाना बिल्कुल नहीं आता था वे भी साल के अंत होते होते रंधनकला में कुशल दीखने लगे थे और पूरे वर्ष भर हम लोगों को, सीमित साधनों के बीच ही सही, देश के विभिन्न प्रदेशों के पकवान का स्वाद मिलता रहा. इन सब नियमों को मान कर चलने में सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि हम सब एक दूसरे के साथ आत्मिक बंधन से बँध गये थे.
इसी क्रम में हमारे दलनेता ने MID WINTER DAY के लिये कार्यक्रम बनाने की योजना शुरु कर दी. Mid Winter Day हर वर्ष 21 जून को पूरे अंटार्कटिका में बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है. इस दिन अंटार्कटिका के सभी शीतकालीन स्टेशन में उत्सव का आयोजन होता है और अपनी-अपनी सुविधा और सामर्थ्य के अनुसार सभी उसमें प्रतिभागी होते हैं. इसके अवसर पर विश्वभर से अंटार्कटिका में रह रहे अभियात्रियों के पास बधाई संदेश आते हैं और एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन के बीच रेडिओ पर बातचीत होती है. अंटार्कटिका में पहली बार शीतकाल बिता रहे अभियात्रियों को इस अवसर पर औपचारिक ढंग से “पोलर मैंन” की उपाधि दी जाती है.
हमारे कलाप्रेमी, अनुभवी और विशिष्ट विज्ञानी दलनेता ने भी हमें प्रोत्साहित किया कि हम सब मिलकर एक सुंदर से कार्यक्रम की रूपरेखा बनाएँ. यह भी तय हुआ कि उस दिन के कार्यक्रम में अतिथि के रूप में उपस्थित रहने के लिये रूसियों को उनके नोवोलज़ारेव्स्काया (Novolazarevskaya) स्टेशन तथा पूर्वी जर्मनी के अभियात्रियों को उनके जॉर्ज फ़ॉर्सटर (Georg Forster) स्टेशन से बुलाया जायेगा. यहाँ बता दूँ कि ‘नोवो’ दक्षिण गंगोत्री से दक्षिण की ओर लगभग 90 कि.मी. दूर शिर्माकर ओएसिस नाम की पथरीली ज़मीन पर स्थित पुराना रूसी स्टेशन है जो आज भी सक्रिय है. उसके लगभग 500 मीटर पूर्व में उन दिनों पूर्वी जर्मनी का जॉर्ज फ़ॉर्स्टर स्टेशन था (अब यह स्टेशन नहीं है). याद रखना होगा कि उस समय तक रूस संयुक्त सोशलिस्ट गणराज्य (USSR) था और पूर्वी तथा पश्चिमी जर्मनी का विलय नहीं हुआ था. कम्यूनिस्ट राष्ट्र पूर्वी जर्मनी पर यू.एस.एस.आर. का राजनैतिक आधिपत्य था. अंटार्कटिका में भी एक छोटे से देश के नन्हें टुकड़े पर एक विशाल देश के वर्चस्व का प्रभाव सुस्पष्ट था.
हमने पूरा अंतर्राष्ट्रीय सौजन्य (Protocol) दिखाते हुए दोनों स्टेशन के दलनेता को अलग-अलग निमंत्रण भेजकर उनसे आग्रह किया कि वे अपने साथियों के साथ 21 जून 1986 को दक्षिण गंगोत्री स्टेशन में पधारने का कष्ट करें. साथ ही कार्यक्रम की तैयारी भी होने लगी.
हम लोग अभियान के शुरु से ही रोज़ एक बार औपचारिक सभा करते थे जिसमें उस दिन किसे क्या करना है तय होता था और आगे के दिनों के लिये भी कार्य निर्धारित किया जाता था. यह दैनिक सभा दलनेता की अध्यक्षता में होती थी. यदि विशेष कोई आदेश नहीं भी देना हो तो भी दलनेता कभी भी दैनिक सभा को न टालते थे और न ही उसकी उपेक्षा करते थे. यहीं पर सबकी समस्याओं का निराकरण होता था, दिल से दिल की बात होती थी तथा औपचारिकता की आड़ में गहन संवेदनशील आत्मिक सम्पर्क स्थापित किया जाता था. ऐसी ही एक सभा में यह निर्णय लिया गया था कि हर सदस्य का जन्मदिन हम लोग औपचारिक ढंग से मनाएँगे, ठीक जैसे घर में रहने पर मनाया जाता है. यही नहीं हर एक के परिवार के सदस्यों (पत्नी व बच्चे) का जन्मदिन भी मनाया जाएगा. अत: बर्फ़ के नीचे छोटे से स्टेशन के अंदर जीवन कभी बोझिल नहीं हुआ. हमारे दल के मौसमविद सदस्य की कहानी कुछ अद्भुत थी. वे वास्तव में ग्रीष्मकालीन दल के सदस्य थे और उन्हें उसी दल के साथ भारत वापस लौट जाना था. लेकिन उनके विभाग के दूसरे सदस्य जिन्हें हमलोगों के साथ ठहरना था, जहाज़ वापस जाने के पहले ही एक अप्रत्याशित दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो गये थे. डॉक्टरों के परामर्श पर उन्हें वापस भेजने का निर्णय लिया गया था. तभी अभियान दल के लिये चिंता का विषय था कि पूरे सालभर तक मौसमविद का काम कौन संभालेगा ! अभियान दल के नेता ने इस युवा मौसमविद से बात की और आग्रह किया कि वे पूरे साल शीतकालीन दल के साथ रहने के लिये राज़ी हो जायें. उन्हें विशेष आपत्ति नहीं थी लेकिन उनकी शर्त थी कि इसमें उनकी पत्नी की सहमति होनी चाहिए. जब वे गोआ में जहाज़ पर सवार हुए थे उस समय दूर आंध्र प्रदेश के किसी स्थान पर उनकी छोटी बेटी का जन्म हुआ था. अर्थात उन्होंने अपनी नवजात पुत्री को देखा भी नहीं था और आस लगाए बैठे थे कि चार महीने बाद जब जहाज़ वापस भारत पहुँचेगा तो वे उस मधुर क्षण को परिवार के साथ जीएँगे. लेकिन उनके साथी के चोटिल होने के कारण समीकरण ही बदल गया था. अभियान दल के नेता का आग्रह, अभियान की आवश्यक्ता, देश का स्वार्थ सब मिलाकर एक अद्भुत परिस्थिति थी. टेलिफोन पर हमारे इन मित्र सदस्य की उनकी पत्नी से बात कराई गयी और उन्हें पूरी परिस्थिति से अवगत कराया गया. सम्भवत: परिवार में और लोगों से परामर्श करने के बाद वे राज़ी हुईं कि उनके पति देश के हित में अंटार्कटिका में रुक जाएँ अगले एक साल के लिये. हम सब ने सलाम किया दोनों के साहस और त्याग को क्योंकि उनमें से किसी एक ने भी यदि अस्वीकृति व्यक्त की होती तो उस वर्ष मौसम सम्बंधी आँकड़े एकत्र नहीं किये जा सकते थे. हम लोगों को जो असुविधा होती वह तो होती ही, वैज्ञानिक आँकड़ों के संकलन कार्य में एक बहुत बड़ा अंतराल आ जाता.
मौसमविद के इन्हीं पुत्री को उद्देश्य कर मैंने लिखा था :

“मात-पिता की विमल कल्पना
बन कर तुम हुई साकार
खुशियाँ जागी, सपने जागे
जागी ममता, जागा प्यार.
*****
जीवन के सुंदर उपवन में
सौरभ ऐसे बिखराना
रहो जहाँ खुश रहो सदा
तुम, जग को भी यह सिखलाना.
*****
करो निरंकुश तुमको जो कुछ
इस जीवन में भाता हो
अमर तुम्हारा जन्मदिन हो
अमिट तुम्हारी गाथा हो.”
सबने इन पंक्तियों की सराहना की तो मुझे आदत सी पड़ गयी थी हर सदस्य के बच्चे के जन्मदिन में कुछ पंक्तियाँ लिखकर उसके पिता को उपहार स्वरूप देना. मेरी रुचि को देखते हुए दलनेता ने मुझे एक गुरुदायित्व सौंपा. हमसे पहले दूसरे शीतकालीन दल ने हाथ से लिखी हुई एक पत्रिका निकाली थी जिसका नाम रखा गया था “हिमवात”. मुझे आदेश हुआ कि हिमवात का 1986 अंक निकाला जाए. मुझे ही रचनाएँ एकत्र करने, उनका सम्पादन करने और उन्हें लिखकर अथवा बाइंड कराके पुस्तक रूप में निकालने का काम करना पड़ेगा. मैंने सहर्ष अपनी स्वीकृति दे दी और अपने काम में जुट गया. इधर Mid Winter Day के लिये कार्यक्रम की रूपरेखा बना ली गयी थी. निश्चय हुआ कि उस दिन हम अपने स्टेशन में एक रंगारंग कार्यक्रम करेंगे जिसमें एक छोटा नाटक (एकांकी), एक कव्वाली और एक ऑर्केस्ट्रा होगा. इसके अलावा काव्यपाठ प्रतियोगिता तथा खेलकूद जैसे टेबल टेनिस, कैरम आदि की प्रतियोगिताएँ भी आयोजित की जाएँगी.
आयोजन की तैयारी का बड़ा हिस्सा था नाटक लिखना, वाद्ययंत्र और गायन में कुछ लोगों को शिक्षित करना तथा नाटक के लिये कॉस्ट्यूम बनाना. ये सभी काम इतने सुचारु ढंग से किये गये कि आज भी सोचकर मुझे आश्चर्य होता है कि कितनी प्रतिभा छुपी हुई थी उस दल के सदस्यों में. सबसे बड़ा आश्चर्य था कॉस्ट्यूम का सिला जाना. इस कला में दक्षता दिखाई हमारे मौसमविद साथी ने. स्टेशन में परदे के लिये कपड़े के थान के थान रखे हुए थे जिनका उपयोग विशेष नहीं था. उन्हीं थान में से काटकर स्टेशन में रखे गये एकमात्र सिलाई मशीन द्वारा दस लोगों के लिये बाकायदा नाप लेकर उन्होंने कॉस्ट्यूम बनाए. दल के प्रतिभाशाली इंजीनियरों ने रिमोट द्वारा चालित पर्दा (drop screen) लगाकर सुंदर सा मंच बनाया जिसपर पूरा कार्यक्रम हुआ था. यह एक बहुत ही सफल कार्यक्रम था जिसमें हम लोगों के साथ रूसी और जर्मन मित्रों ने भी बहुत आनंद लिया. सभी सदस्य की कोई न कोई खूबी सबके सामने उभरकर आ रही थी. दल का मनोबल सातवें आसमान पर था और हमें गर्व था हमारे दलनेता की दूरदृष्टि पर. मैं भी नये जोश के साथ “हिमवात” को साकार करने के लिये तत्पर हो उठा.
(मौलिक तथा अप्रकाशित सत्य घटना)

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Comment

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Comment by Vindu Babu on January 15, 2014 at 10:21am

आदरणीय शरदेन्दु सर आपका यह लेख भी इतना रोचक है और ज्ञानवर्धक है कि एक बार में ही पूरा पढ़ गयी।

आपने इतना जीवंत लिखा  पढ़ते-पढ़ते ऐसा लगा मानो मेरा ही अनुभव रहा हो। उन महानुभाव(मौसमविद) के समर्पण को प्रणाम है और उनकी बेटी के लिए ढेरों शुभकानाएं।

कितना उत्साहपूर्ण रहा होगा MID WINTER DAY का रंगारंग कार्यक्रम!

आपका बहुत आभार आदरणीय...झलक प्रस्तुत करने के लिए

सादर

Comment by vijay nikore on January 12, 2014 at 7:34am

आदरणीय शरदिंदु जी,

 

आपकी पूर्व शृंखलाओं के समान यह भी अति रोचक है। अपने-अपने घर से इतनी दूर आप सब ने आपसे में परिवार-सा माहौल बनाया, मन को बहलाए रखा ...यह आसान नहीं है। इस शृंखला के लिए भी बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on January 12, 2014 at 2:39am

आदरणीय शुभ्रांशु जी तथा सौरभ जी का हार्दिक आभार. आपलोगों ने मेरा उत्साह बनाए रखा है. सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 7, 2014 at 11:02pm

जब कोई सार्थक उद्येश्य जीवन का अर्थ बन जाये तो सांसारिक विसंगतियाँ कबतक बड़ी बाधा बनी रह पाती हैं ? ऐसा कम ही होता है जब कोई विचार इतना सान्द्र हो किन्तु क्रियान्वित न हो पाये. ऐसा तभी होता है जब विचार के क्रियान्वित होने का समय नहीं आया है. और वह अपने मनोमय दशा को अनवरत रहने देना चाहता है.
आपके अंटार्कटिका के प्रवास के दौरान जो अनुभव हुए हैं वे सभी सहयात्रियों के साथ आपके अदम्य साहस और आप सबों की जिजीविषा का परिचायक मात्र नहीं हैं. बल्कि एक सार्थक उद्येश्य की पूर्णता के कारण के पहलू हैं.
और आपकी रचना-यात्रा का वर्णन सुनना भी सुखद लगा.
इस शृंखला की नवीन कड़ी के लिए बधाई, आदरणीय शरदिन्दुजी.
सादर
 

Comment by Shubhranshu Pandey on January 7, 2014 at 9:52am

आदरणीय शरदेन्दु जी, एक बार फ़िर से श्वेत महादेश पर आपके साथ घुमने का मौक मिला. सांस्कृतिक आयोजन के कुछ और रंग देखने की इच्छा हो रही थी..रुस और जर्मनी वाले कार्यक्रम देख गये हमें भी देखना था कि उस उठते गिरते पर्दों के पार क्या क्या हुआ....

सादर.

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