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संघे शक्ति(लघुकथा)

संघे शक्ति
***
पका फल पेड़ पर लटका हुआ था।भालू परेशान था।वह चाहता था कि पका फल उसका रेंगता हुआ बेटा तोड़ लाए जिससे कुल खानदान का यश उजागर हो।पर बेटा वहां तक पहुंचे कैसे,यह यक्ष प्रश्न बना हुआ था। दूसरे भालू,लोमड़ी से बातें हुईं।उम्मीद बंधी।समय मुकर्रर हुआ।भीड़ जुट गई कि स्वर्गवासी भालू काका का पोता आज ऊंचे पेड़ से फल तोड़ लाएगा, भालू भाई और लोमड़ी काकी उसे ऊपर तक पहुंचने में मदद करेंगे। पर यह क्या.....?समय गुजरते निकल गया।न भालू काका आये,न लोमड़ी काकी। बेचारा बाप मन मसोसता रहा। सारे साथियों की टोली बिखरने लगी।और उधर से हाथी भाई घूमते हुए पहुंच गए,साथ में संगी साथी भी थे।पका फल देख लालच उमड़ा।उन्होंने पेड़ ही हिला दिया। फल जमीन पर था।संगी साथी उसे चखने लगे।हाथी भाई सुगंध का मज़ा ले रहे थे।पेड़ पर बैठी गिलहरी बोली,"बहुत खूब भैया!फल तोड़ने के लिए पेड़ पर चढ़ना ज़रूरी तो नहीं।"
हाथी के संगी साथी ऐलान कर रहे थे......संघे शक्ति ताई,संगे शक्ति!!"
" मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Samar kabeer on November 25, 2019 at 2:04pm

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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