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कभी खूनी, कभी कातिल

कभी गुनाहों का मार्ग कहलाती

जुर्म को होते देख चीखती

खून खराबे से मैं थर्राती

कभी खून की प्यासी तो

कभी डायन हूँ कहलाती

चाह के भी कुछ कर ना पाती

बेबसी पर नीर बहाती ||

 

हैवानियत की, कभी बलात्कार की,   

ना चाह मैं साक्षी बनती

हत्या कभी षडयंत्रो का

अंजान देने पथ भी बनती

तैयार की गई हर साजिश को   

हादसो का मैं नाम दिलाती   

निर्दयता में साथ निभा तेरा

आत्मा को अपनी फटकार लगाती

भयानक दर्द से मै चीख चीख कर  

अपनी बेबसी जब नीर बहाती||

 

घटित हर अपराध की

गवाही देने का पुरजोर लगाती

पर कशमश की स्थिति पाती

कभी भूत प्रेत का बनू बसेरा

कभी मार्ग सुनसान मैं कहलाती

कभी पत्थर रोड़ी से बाते कर

हर घटना का विस्तार बताती

किस्मत पर अपनी आसू बहाती|

 

किसे सुनाऊ अपनी व्यथा

स्वार्थी दुनिया सुन ना पाती

दहाड़ मार के रो रही मैं

पर दर्द ब्याँ मै कर ना पाती

पाप किसी का करनी किसी की

हर घटना की दोषी दुनियाँ मुझे बनाती

एक सड़क की बेबसी पर

खड़ी होकर फिर वो मुस्काती|

“मौलिक व अप्रकाशित”

Views: 57

Comment

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Comment by PHOOL SINGH on August 27, 2019 at 3:01pm

कबीर साहब को नमस्कार मेरी रचना को पसंद करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद 

Comment by Samar kabeer on August 25, 2019 at 2:18pm

जनाब फूल सिंह जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

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