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ग़ज़ल नूर की- लगती हैं बेरंग सारी तितलियाँ तेरे बिना

लगती हैं बेरंग सारी तितलियाँ तेरे बिना
जाने अब कैसे कटेंगी सर्दियाँ तेरे बिना.
.
फैलता जाता है तन्हाई का सहरा ज़ह’न में
सूखती जाती हैं दिल की क्यारियाँ तेरे बिना.
.
साथ तेरे जो मुसीबत जब पड़ी, आसाँ लगी
हो गयीं दुश्वार सब आसानियाँ तेरे बिना.
.
तू कहीं तो है जो अक्सर याद करता है मुझे
क्यूँ सताती हैं वगर्ना हिचकियाँ तेरे बिना?
.
वक़्त लेकर जा चुका आँखों से ख़ुशियों के गुहर   
अब भरी हैं ख़ाक से ये सीपियाँ तेरे बिना. .
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 1033

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 23, 2025 at 7:06pm

धन्यवाद आ. नाथ जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 23, 2025 at 7:06pm

धन्यवाद आ. विजय जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 23, 2025 at 7:06pm

धन्यवाद आ. अजय जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 23, 2025 at 7:05pm

धन्यवाद आ. लक्ष्मण जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 23, 2025 at 7:05pm

धन्यवाद आ. समर सर. पता नहीं मैं इस ग़ज़ल पर आई टिप्पणियाँ पढ़ ही नहीं पाया 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 23, 2025 at 7:05pm

धन्यवाद आ. रचना जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 23, 2025 at 7:05pm

धन्यवाद आ. तेजवीर सिंह जी 

Comment by नाथ सोनांचली on July 12, 2019 at 3:41pm

आद0 नीलेश नूर जी सादर अभिवादन। बेहतरीन ग़ज़ल कही आपने। दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ

Comment by vijay nikore on July 10, 2019 at 4:29pm

बहुत ही खूबसूरत गज़ल के लिए बधाई, आदरणीय निलेश जी।

Comment by Ajay Tiwari on July 6, 2019 at 9:35am

आदरणीय निलेश जी, शेर सारे बहुत खूब हैं. आख़िरी शेर ख़ास तौर पर अच्छा लगा. हार्दिक बधाई.

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