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झूठ फैलाते हैं अक़्सर जो तक़ारीर के साथ (१५)

(२१२२ ११२२ ११२२ २२/११२ )
झूठ फैलाते हैं अक़्सर जो तक़ारीर के साथ
खेल करते हैं वतन की नई तामीर के साथ 
***
ख़्वाब देखोगे न तो खाक़ मुकम्मल होंगे 
ये तो पैवस्त* हुआ करते हैं ताबीर के साथ 
***
जो बना सकते नहीं चन्द निशानात कभी 
हैफ़* क्या हश्र करेंगे वही तस्वीर के साथ 
***
ग़म भी हमराह ख़ुशी के नहीं रहते,जैसे
कोई शमशीर कहाँ रहती है शमशीर के साथ
***
ऐसे इन्साफ़ के होते न मआनी कोई 
जो कि मुफ़लिस को मिले गर बड़ी ताख़ीर के साथ 
***
जुर्म का साथ निभाएगा न ईमान कभी 
सांस लेना नहीं मुमकिन कभी नक्सीर के साथ 
***
ख़ून बहता है अभी अम्न के हालात नहीं 
और क्या बाक़ी बचा होना है कश्मीर के साथ 
***
ये तक़ाज़ा है कि अख़लाक़ का दामन थामें 
तंज़ मत कीजिये कोई किसी दिलगीर के साथ 
***
आप हरगिज़ न करें गौर लक़ीरों पे 'तुरंत '
क़ुफ़्ल तक़दीर का खोलें ज़रा तदबीर के साथ
***
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' बीकानेरी 

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by Samar kabeer on January 22, 2019 at 11:01pm

आप दोनों की महब्बत के लिए शुक्रगुज़ार हूँ

Comment by Md. anis sheikh on January 22, 2019 at 6:36pm

आप का ही नहीं गहलोत जी हमारा भी यही हाल है अपनी गलती दिखाई नहीं देती ,और बात सिर्फ गलती पकड़ने कि नहीं है समर सर को ग़ज़ल को सजाना आता है     , वैसे आप बहुत अच्छा लिखते हैं 

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 21, 2019 at 10:05pm

आदरणीय  Md. anis sheikh साहेब आदाब | आपकी हौसला आफ़जाई के लिए शुक्रगुज़ार हूँ | यक़ीनन समर कबीर साहेब ,उन खामियों पर नज़र रखते हैं जो मुझे दिखाई भी नहीं पड़ती | ख़ुदा ने उन्हें इस हुनर से नवाज़ा है | 

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 21, 2019 at 10:02pm

आदरणीय Samar kabeer साहेब आदाब | पहली बार ऐसा महसूस हो रहा है कि एक सही गॉडफादर मुझे मिल गया है | आपकी इस्लाह इतनी सटीक होती है कि दिल से दाद निकलती है इस्लाह पर | चूँकि ग़ज़ल के बाबत जो कुछ सीखा है सिर्फ ३ साल में सीखा है जो बहुत कम समय है ग़ज़ल को समझने के लिए | आपकी सरपरस्ती अवश्य कुछ नींव मज़बूत करेगी ,ऐसी उम्मीद होने लगी है | आपकी इस्लाह के अनुसार संशोधन कर रहा हूँ | सादर आभार | 

Comment by Md. anis sheikh on January 21, 2019 at 12:35pm

जनाब गिरधारी सिंह गहलोत तुरंत जी ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है, समर ने इतनी बारिकी से छाना है ग़ज़ल को उसका तो जवाब ही  नहीं ,हवा छानने का हुनर रखते है सर आप  ,हायड्रोजन ,ऑक्सीजन अलग कर दें ,मज़ा आ गया |

Comment by Samar kabeer on January 21, 2019 at 11:31am

ग़म मेरे पास हमेशा नहीं रह पाते हैं 
कोई शम्शीर कहाँ रहती है शम्शीर* के साथ'

इस शैर को आप चाहें तो इस तरह कर सकते हैं:-

'ग़म भी हमराह ख़ुशी के नहीं रहते,जैसे

कोई शमशीर कहाँ रहती है शमशीर के साथ' 

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 20, 2019 at 3:00pm

आदरणीय Samar kabeer साहेब आदाब | आपकी हौसला आफ़जाई का तहे दिल से शुक्रिया | ऐबे -तनाफ़ूर का मुआमला तो विवादास्पद ही रहता है | लेकिन जिस बारीकी का आपने ज़िक़्र किया वह तो अवश्य गौर करने लायक है | ये नुक्ता तो आप न बताते तो मेरे ध्यान में ही नहीं आता | ये तो शतुरगुरबा ही हो गया शायद | ताला शब्द तो उर्दू और हिंदी में एक ही होता है यही मान कर प्रयोग किया | लेकिन आपकी इस्लाह ज्यादा प्रभावी है | वही संशोधन कर रहा हूँ | शमशीर वाले शेर का कुछ हो सकता है तो बताएं वरना ख़ारिज़ करना ही ठीक होगा | 

Comment by Samar kabeer on January 20, 2019 at 11:50am

जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'ग़म मेरे पास हमेशा नहीं रह पाते हैं
कोई शम्शीर कहाँ रहती है शम्शीर* के साथ'

इस शैर के ऊला मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर देखें,दूसरी बात ये कि कथ्य पर विचार करें,ऊला मिसरे में 'हमेशा' और सानी मिसरे में 'कहाँ',यानी ग़म हमेशा नहीं रहते लेकिन रहते तो हैं,लेकिन शमशीर नहीं रहती,इस बारीक नुक्ते पर ग़ौर करें ।

'खोलिये ताला-ए-तक़दीर को तदबीर के साथ'

इस मिसरे में 'ताला' शब्द हिन्दी भाषा का है,इसलिए इसमें इज़फ़त नहीं लगेगी,इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:-

"क़ुफ़्ल तक़दीर का खोलें ज़रा तदबीर के साथ '

 

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