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लेकिन कज़ा के बाद से मक़तल उदास है

221 2121 1221 212


आया सँवर के चाँद चमन में उजास है ।
बारिश ख़ुशी की हो गयी भीगा लिबास है ।।

कसिए न आप तंज यहां सच के नाम पर ।
लहजा बता रहा है कि दिल में खटास है ।।

मिलता नशे में चूर वो कंगाल आदमी ।
शायद खुदा ही जाम से भरता गिलास है ।।

उल्फत में हो गए हैं फ़ना मत कहें हुजूर ।
जिन्दा अभी तो आपका होशो हवास है ।

पीकर तमाम रिन्द मिले तिश्नगी के साथ ।
साकी तेरी शराब में कुछ बात ख़ास है ।

हुस्नो अदा के ताज पे चर्चा बहुत रही ।
अक्सर तेरे रसूक पे लगता कयास है ।।

खुशबू सी आ रही है मेरे इस दयार में ।
महबूब मेरा आज कहीं आस पास है ।।

मक़तूल की सजा थी या कातिल का था गुनाह ।
लेकिन कज़ा के बाद से मक़तल उदास है ।।

-- नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Ram Awadh VIshwakarma on Wednesday

आदर्णीय बहुत खूबसूरत.ग़ज़ल आपने कही है । हार्दिक बधाई।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Monday

सुंदर गजल हुयी है हार्दिक बधाई।

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