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"चाचा, ईहाँ हमनीके बानी सन । तूँ कतहीं अऊरी जा के सूत जा ।"

नन्द किशोर जी को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ । बड़े भाई की जो लड़कियां उनके कंधों पर खेल कूद कर बड़ी हुयी आज उन्होंने ही उन्हें घर से बाहर जाने के लिए कह दिया, वो भी ऐसे मौके पर जब बड़े भाई की तेरहवीं का सारा काम उन्होने आज ही निपटाया था ।

नन्द किशोर जी अपने पिता के एकलौते पुत्र थे और श्रीनाथ जी, जिनकी आज तेरहवी थी, उनके ताऊजी के पुत्र थे। समय के साथ परिवार बड़ा हुआ तो संयुक्त परिवार का भी बटवारा हो गया । बटवारे के बाद भले ही पुराने घर का आधा-आधा हिस्सा नन्द किशोर जी और श्रीनाथ जी के हिस्से में आया था लेकिन दिलों का बटवारा नहीं हुआ था अबतक । हर दुख-सुख में पूरा परिवार साथ रहता था । श्रीनाथ जी के कोई लड़का नहीं था जब की नन्द किशोर जी के तीन लड़के और दो लड़कियां थीं ।

पिता के निधन के साल भर बाद श्रीनाथ जी की दोनों लड़कियों ने पुराने घर को तोड़ कर पीते के हिस्से वाली जगह पर नया घर बनाने का प्लान किया और जिस दिन से काम शुरू किया जाना था उसके बारे बारे में नन्द किशोर जी को सूचित कर दिया ।

घर तोड़ने का काम शुरू होने से ऐन पहले नन्द किशोर जी पूरी जमीन के कागजात लेकर उपस्थित हो गए । कहा – "देख लॉगिन, ई पूरा जमीन हमरा नाम से बा । हई रजिस्ट्री हमार दादा हमरा नाम से करवा के गइल बाड़े । तूँ लोगिन हमार लाईका हऊ लोगिन, त भले एह घर में रह लोगिन । हमरा लगे जहिया पईसा होखी, तहिए हम घर बानवाएब ।"

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Neelam Upadhyaya on December 14, 2017 at 4:37pm

 

अदरणीय समर कबीर जी लघु कथा पसंद करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ।

Comment by Samar kabeer on December 14, 2017 at 3:01pm

इस सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।

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