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एक कोयल कूकती है पास की अमराई में,

आजकल मैंने सुना है रात की गहराई में।

हो रहा था मेघ गर्जन साथ ही वृष्टि घनी,

क्या बुलाती है किसी को या हुई वो बावली?

फिर ये सोचा हो न मुश्किल की कहीं कोई घड़ी,

भीग शीतल नीर थर – थर काँपती हो वो पड़ी।

कुहू – कुहू सुनते हुए मैं मन ही मन गुनता रहा..

पक्षियाँ तो शाम ढलते नीड़ में खो जाती हैं,

घिरते तिमिर के साथ ही वो नींदमय हो जाती हैं।

तभी कौंधा मन, अरे ! ये धृष्टता दिखलाती है,

दुष्ट पंछी मधुर स्वर में काक को खिजलाती है,

शायद लगी आदत इसे ना रात को सो पाती है।

जब हुई ये चुप सुबह तक यूँ लगा किस्सा ख़तम,

किंतु फिर जो ढली संध्या चल पड़ा वही उपक्रम,

आज तो बारिश नहीं थी और था न हि मेघ गर्जन!

काक काकिन सो रहे सब नीड़ भीतर निविड़ तम!

अब मैं समझा ये तो यूँ ही मस्तियाँ छलका रही,

अपनी मर्जी के मुताबिक रात – दिन है गा रही।

 - करीब (मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 11, 2017 at 5:30pm

मोहम्मद आरिफ साहब और समर कबीर साहब, सादर नमस्कार। प्रोत्साहन पाकर हिम्मत में बढोत्तरी होती है, अंतर्मन से आभारी हूँ।

श्रेष्ठजनों के सुझाव से कोई भी कार्य सुंदर से सुंदरतम होता चला जाता है। किसी भी सुझाव का ह्रदय से स्वागत है।

Comment by Samar kabeer on August 10, 2017 at 6:15pm
जनाब श्याम किशोर सिंह'क़रीब'जी आदाब,सुंदर प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Mohammed Arif on August 10, 2017 at 11:20am
आदरणीय श्याम किशोर जी आदाब, अच्छी भावाभिव्यक्ति । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । बाक़ी गुणीजन सुझाव देंगे ।

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