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गुरु पूर्णिमा पर गुरु को समर्पित मुक्तक

हमेशा शिष्य का गुरु ही यहाँ पतवार बनता है|
कृपा उसकी अगर बरसे सफ़ल संसार बनता है||
मृदा का रूप अनगढ़ ही लिये फिरते यहां सारे |
पड़े जब थाप उसकी तो कोई आकार बनता है ||

सदा आदर करें गुरु का जो जाने सार भवसागर |
बिना जिसके भटकता है जहाँ हर बार भवसागर||
जलाये ज्ञान का दीपक जगाकर चेतना मन मे |
मिटाकर दोष जीवन का कराये पार भवसागर ||

मनुष्यों का मिलन जगदीश से गुरुवर कराते हैं|
नहीं जब सूझता कुछ हो नजर गुरुदेव आते हैं||
सखा बनते कभी हैं वो कभी माँ बाप बन जाएं|
सदा बन पथ प्रदर्शक राह वो अच्छी दिखाते हैं||

असम्भव है नही कुछ भी अगर विश्वास बन जाये
विजेता विश्व का वो हो जो गुरु का खास बन जाये
अगर गुरु का भरोषा हो अडिग चाणक्य सा यारों|
मिले आशीष फिर उसका नया इतिहास बन जाये|

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by नाथ सोनांचली on August 2, 2017 at 4:31am
आद0 समर साहब प्रणाम, आपकी स्नेहमयी प्रतिक्रिया से उत्साह बढ़ता है। हृदय से आभार आपका।
Comment by नाथ सोनांचली on August 2, 2017 at 4:31am
आद0 समर साहब प्रणाम, आपकी स्नेहमयी प्रतिक्रिया से उत्साह बढ़ता है। हृदय से आभार आपका।
Comment by नाथ सोनांचली on August 2, 2017 at 4:30am
आद0 समर साहब प्रणाम, आपकी स्नेहमयी प्रतिक्रिया से उत्साह बढ़ता है। हृदय से आभार आपका।
Comment by vijay nikore on July 13, 2017 at 7:42pm

बहुत ही सुन्दर मुक्तक। बधाई।

Comment by नाथ सोनांचली on July 12, 2017 at 7:59pm
आद0 गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी सादर अभिवादन।
यह मुक्तक बह्र 1222 1222 1222 1222 पर लिखा है। आप एक गजलकार भी हैं। इसलिए आप इसे बेहद आसानी से समझ सकते है। फिर भी मैं आपके भ्रम को यथाशक्ति दूर करने की कोशिश करता हूँ।

पड़े जब थाप उसकी तो कोई आकार बनता है ||
पड़े जब था 1222 /प उसकी तो 1222 /कोई आका 1222 /र बनता है 1222

अब आपका अगर भ्रम 'कोई' की मात्रा को लेकर है तो सर् आदर के साथ कहना चाहूंगा कि 'कोई' को बह्र के हिसाब से 12 ले सकते है। और आप एक गजलगो है इसलिए आप इस बात से भलीभांति परिचित होंगे, ऐसी मुझे उम्मीद है।

आगे भी बताना चाहूंगा कि ग़ज़ल की तरह मुक्तक में भी मात्राप्तन का वही विधान होता है। जैसा मैंने अपने उस्ताद से सीखा है। यह मुक्तक पूर्णरूपेण मुफाईलन मुफाईलन मुफाईलन मुफाईलन पर आधारित है। फिर भी शंशय है तो इसे गुणीजन ही दूर कर सकते हैं।सादर
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 12, 2017 at 6:14pm

आ० कुरुक्षत्राप जी .आपकी रचना  विधाता  छंद के अधिक  सन्निकट है  १२२२ का व्यवहार भी कहाँ सही है देखिये -

कोई  आकार  बनता है  २२२२  १२२२

जो जाने सार भवसागर  २२२२ १२२२   आदि --------अब देखिये आपकी  मात्राएँ  १२२२ १२२२ . १२२२ १२२२  (१४,१४ ) हुयी या नहीं  यही तो बिधाता छंद है ------- सादर

Comment by नाथ सोनांचली on July 11, 2017 at 10:40pm
बृजेश कुमार ब्रज जी सादर अभिवादन, हॄदय से आभार आपको प्रोत्साहन के लिए।
Comment by नाथ सोनांचली on July 11, 2017 at 10:39pm
आद0 शेख शहजाद उस्मानी साहब सादर अभिवादन, उक्त रचना पर आपकी प्रतिक्रिया और प्रशंशा से अभिभूत हूँ, सादर आभार
Comment by नाथ सोनांचली on July 11, 2017 at 10:38pm
आद0 समर कबीर साहब सादर प्रणाम, रचना पर आपके आशीष और प्रशंशा से अभिभूत हूँ।सादर।
Comment by नाथ सोनांचली on July 11, 2017 at 10:36pm
आद0 गोपाल जी सादर अभिवादन, मुक्तक पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार।
यह मुक्तक 1222 1222 1222 1222 पर लिखा गया है और जो हर तरह से सही है। आप खुद में इसे जांच लीजिये

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