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ग़ज़ल(दिल बचाया तो तेरा जिगर जाएगा )

फाइलुन -फाइलुन-फाइलुन-फाइलुन

वक़्ते तन्हाई मेरा गुज़र जाएगा |
तू अगर साथ शब भर ठहर जाएगा |

मुझको इज़ने तबस्सुम अगऱ मिल गई
तेरा मगरूर चेहरा उतर जाएगा |

मालो दौलत नहीं सिर्फ़ आमाल हैं
हश्र में जिनको लेकर बशर जाएगा |

उसके वादों पे कोई न करना यक़ी
वो सियासी बशर है मुकर जाएगा |

देखिए तो मिलाकर किसी से नज़र
खुद बखुद ही निकल दिल से डर जाएगा |

आप खंजर का एहसान लेते है क्यूँ

मुस्कराहट से दीवाना मर जाएगा |

.

तीर तस्दीक़ तिरछी निगाहों का है

दिल बचाया तो तेरा जिगर जाएगा |

(मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 22, 2017 at 5:08pm
मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब आदाब, ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया,महरबानी---अगर वक़्त के साथ इज़ाफ़त नहीं लग सकती तो लुगात में वक़्ते बद और वक़्ते फ़ज़ीलत किस तरह लिया गया है? इज़्ने तबस्सुम ---मतलब मुस्कराने की इजाज़त को "मिल गई " बोलेंगे या "मिल गया "यह समझ में नहीं आया ---सादर
Comment by Samar kabeer on April 22, 2017 at 2:55pm
जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले के ऊला मिसरे में 'वक़्त'शब्द अरबी भाषा का है, इसलिये इज़ाफ़त नहीं लगेगी ।
'मुझको इज़्न-ए-तबस्सुम अगर मिल गई'
इस मिसरे में 'इज़्न'और 'तबस्सुम'दोनों ही शब्द पुल्लिंग हैं,इसलिये 'मिल गई'को 'मिल गया'करना उचित होगा ।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 22, 2017 at 1:53pm

मुहतरम जनाब आरिफ़ साहिब आदाब , ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफज़ाई
का बहुत बहुत शुक्रिया ,महरबानी ----

Comment by Mohammed Arif on April 22, 2017 at 1:34pm
उसके वादों पे कोई न करना यक़ी
वो सियासी बशर है मुकर जाएगा । वाह!वाह!! बहुत ही सामयिक शे'र
आप खंज़र का एहसान लेते हैं क्यूँ
मुस्कराहट से दीवाना मर जाएगा ।वाह!वाह!!क्या ख़ूब आशिक़ी शे'र कहा है
पूरी ग़ज़ल ही बेहतरीन । शे'र दर शे'र मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए ।

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