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ग़ज़ल(दिल बचाया तो तेरा जिगर जाएगा )

फाइलुन -फाइलुन-फाइलुन-फाइलुन

वक़्ते तन्हाई मेरा गुज़र जाएगा |
तू अगर साथ शब भर ठहर जाएगा |

मुझको इज़ने तबस्सुम अगऱ मिल गई
तेरा मगरूर चेहरा उतर जाएगा |

मालो दौलत नहीं सिर्फ़ आमाल हैं
हश्र में जिनको लेकर बशर जाएगा |

उसके वादों पे कोई न करना यक़ी
वो सियासी बशर है मुकर जाएगा |

देखिए तो मिलाकर किसी से नज़र
खुद बखुद ही निकल दिल से डर जाएगा |

आप खंजर का एहसान लेते है क्यूँ

मुस्कराहट से दीवाना मर जाएगा |

.

तीर तस्दीक़ तिरछी निगाहों का है

दिल बचाया तो तेरा जिगर जाएगा |

(मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 24, 2017 at 5:09pm
जनाब नीलेश साहिब,मश्वरे का बहुत बहुत शुक्रिया ---
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 24, 2017 at 5:07pm
जनाब अनुराग साहिब,ग़ज़ल में आपकी शिरकत, हौसला अफजाई और मश्वरे का बहुत बहुत शुक्रिया----
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 24, 2017 at 10:36am

आ. तस्दीक़ साहब...
मैंने  मिसरा नहीं दिया है.... एक  तरकीब सुझाई है ...
जैसे
देखिये तो खाकर कहने की जगह खाकर तो देखिये अधिक आग्रही और ग्राह्य होता है ....बाक़ी आपकी ग़ज़ल है..जैसा आप उचित मानें 
सादर 

Comment by Anuraag Vashishth on April 24, 2017 at 10:28am

आ. तस्दीक साहब,

आपकी ग़ज़ल की रवानी प्रभावित करने वाली है. बधाई हो.

आ. समर साहब द्वारा 'इज्ने तबस्सुम' पर की गई लिंग सम्बन्धी आपत्ति जायज है. 'इज्न' का मतलब 'इजाजत' जरूर स्त्रीलिंग है लेकिन इसकी वजह से उसे पुल्लिंग की तरह नहीं बरता जा सकता. दो शब्दों का अर्थ एक होते हुए भी लिंग अलग-अलग हो सकते है. जैसे 'तबस्सुम' पुल्लिंग है लेकिन उसका  अर्थ 'मुस्कान' स्त्रीलिंग अब इसकी वजह से कोई 'तबस्सुम' को स्त्रीलिंग में बरतना चाहे तो यह जायज नहीं होगा . कई बार तो एक ही शब्द अलग भाषाओँ में अलग अलग लिंगों में बरता जाता है जैसे 'कलम' उर्दू में पुल्लिंग है, हिंदी में स्त्रीलिंग और संस्कृत में नपुंसक लिंग.

जहाँ तक अरबी शब्दों पर इजाफत की बात है तो मनाही तो रही है लेकिन अरबी शब्दों पर इजाफत इस्तेमाल की जाती रही है जैसे अहदे-संग, अहले-कलम, अहले-रोजगार, आलमे-ख्वाब आदि. (इनमें पहला लफ्ज अरबी और दूसरा फ़ारसी का है) अब इस तरह के शब्द फ़ारसी और उर्दू के आम मुहावरे का हिस्सा बन चुके हैं. ‘वक्ते तन्हाई’ कुछ अटपटा इसलिए लग रहा है कि यह उर्दू के आम मुहावरे का हिस्सा नहीं है.जैसे वक्ते-रुखसत तो मुहावरे का हिस्सा बन चुका है लेकिन वक्ते-जुदाई अटपटा लगता है.

सादर  

 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 23, 2017 at 11:41am

जनाब नीलेश साहिब , ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया
शब्द "वक़्त "(अरबी ),तन्हाई (फ़ारसी ), बद (फ़ारसी ),फ़ज़ीलत(अरबी )के हैं ,फ़िरोज़ूल्लुगात में
वक़्ते बद और वक़्ते फ़ज़ीलत , इस्तेमाल किए गये हैं , नार्वा की कोई मान्यता नहीं है |
देखिए तो मिलाकर किसी से नज़र ------मेरे हिसाबसे "तो" भरती का नहीं बल्कि मेन शब्द है
जिसपर "देखिए " शब्द का ज़ोर है|" मिला कर तो देखें किसी से नज़र "'मिसरा बह्र में नहीं होगा
"खुद ब खुद ही निकल दिल से डर जाएगा " इस मिसरे का दारोमदार पढ़ने वाले पर है कि वो
किस अंदाज़ में पढ़ता है , मेरे हिसाब से मज़मून मुकम्मल है |
"मुस्कराहट से दीवाना मर जाएगा "' शब्द दीवाना का "ना" नहीं बल्कि "अलिफ " गिराया गया है
शब्द दीवान और दीवाना दोनो अलग अलग हैं | आपके मशवरे का शुक्रिया ------सादर

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 23, 2017 at 11:09am

जनाब रवि  साहिब , ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया  

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 23, 2017 at 9:42am

आ. तस्दीक़ साहब... बहुत शानदार ग़ज़ल के लिये बधाई ..
शब्द   अगर एक ही भाषा के हैं (या अरबी-या फ़ारसी) तो ही इज़ाफ़त स्वीकार्य है...
वक़्त   और तन्हाई का त साथ आने से भी नारवा प्रतीत होता है ..(हालाँकि कोई मानता नहीं है अब इसे)
.
मालो दौलत नहीं सिर्फ़ आमाल हैं 
हश्र में जिनको लेकर बशर जाएगा |... ये बहुत अच्छा शेर लगा मुझे ...बधाई 
.
देखिए तो मिलाकर किसी से नज़र ...
मिलाकर तो देखें किसी से नज़र ... देखिये के बाद का तो भर्ती है... मिलाकर के बाद लेंगे तो ज़ुबान का हिस्सा हो जाएगा ..
.
खुद बखुद ही निकल दिल से डर जाएगा |...ऐसा लगता है कि कोई निकल नाम का शख्स दिल से डर जायेगा... मिसरा भाषाई लिहाज़ से ठीक नहीं है ..
.
मुस्कराहट से दीवाना मर जाएगा |... दीवाना का ना गिराना इसलिए सही नहीं है क्यूँ कि दीवान एक सार्थक शब्द बनता है ..ये भी मानने न मानने की बात है ..
ग़ज़ल के लिये पुन: बधाई 

Comment by Ravi Prabhakar on April 23, 2017 at 9:05am

टेक्‍नीकलिटी तो भई गुणीजन ही जाने पर ग़ज़ल पढ़ मुझे बहुत अच्‍छा लगा। विशेषकर -

आप खंजर का एहसान लेते है क्यूँ

मुस्कराहट से दीवाना मर जाएगा |

हार्दिक शुभकामनाएं स्‍वीकारें ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 22, 2017 at 7:59pm
मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब आदाब,जो लेटेस्ट फिरोज़ुल लुगात है उसमें पेज नंबर 1412और 1413 पर यह शब्द मौजूद हैं यह लुगात नेट पर भी है ----लुगात में इज़्न का मतलब "हुक्म",और इजाज़त" लिखा है ,अगर हुक्म मानें तो मिल गया आना चाहिए और अगर इजाज़त लें तो मिल गया कैसे आयेगा ?,--"मुस्कराने की इजाज़त मिल गई "या "मुस्कराने का इजाज़त मिल गया "क्या सही होना चाहिए ,---सादर
Comment by Samar kabeer on April 22, 2017 at 6:02pm
मेरे पास जो फिरोज़ुललुग़ात है उसमें तो आपके बताये गये शब्द नहीं हैं,और 'इज़्न'और 'तबस्सुम'दोनों पुल्लिंग हैं तो मिल गई कहाँ तक ठीक है भाई ।

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