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उसका मुझसे दूर जाके मेरे पास आना ज़रूरी तो नही
जो भुला हो मुझे उसे मेरा याद आना ज़रूरी तो नही

आ जाती हैं इस चेहर पे खामोशियाँ कभी कभी
हर वक़्त, बेवजह मेरा मुस्कुराना ज़रूरी तो नही

आकर गले मिलते हैं यूँ तो मुझसे कई हर रोज़
हर शख्स का दिल मे उतर जाना ज़रूरी तो नहीं

कभी पीने पड़ते हैं गम तो कभी मिलते है आँसू
हर रात मेय से भरा हो पैमाना ज़रूरी तो नही

कुछ को मिलते हैं पत्थर,कुछ खुद पत्थर हो जाते हैं
ताजमहल बनवाए यहाँ हर दीवाना ज़रूरी तो नही

मलमल के बिस्तर पे भी कट जाती हैं रातें जाग जाग
गर है सोने की थाली मे ,मीठा हो खाना ज़रूरी तो नही

हर रोज़ मिलता है नये नये भेस मे मुझसे उपरवाला यहाँ
फिर उससे मिलने मंदिर या मज़्ज़िद जाना ज़रूरी तो नही

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 5, 2010 at 6:04pm
आकर गले मिलते हैं यूँ तो मुझसे कई हर रोज़
हर शख्स का दिल मे उतर जाना ज़रूरी तो नहीं

कभी पीने पड़ते हैं गम तो कभी मिलते है आँसू
हर रात मेय से भरा हो पैमाना ज़रूरी तो नही

waah Pallav jee waah, aap ki yey Gazal sidhey dil ko chhu rahi hai, bahut hi umdda likha hai aapney, eesi tarah ki rachnao ka aagey bhi intjaar raheyga,

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 30, 2010 at 7:09pm
Jiyo Pallav Jiyo, aj tumhari Ghazal ne dil khush kar diya. Khayalon mein ab kafi gehrayi aa rahi hai, magar alfaaz kahin kahin sath chhod jatey hain. 6th sheyar ka doosra Misra (2nd line) bahut halka hai baat jachi nahi wahan. Akhri sheyar mein bhav to bahut acchey hain magar wo hadd se zyada bewazan ho gaya hai. In dono sheyaron par thodi mehnat aur karo. Shabaash!!!!

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