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गजल - अनमोल पल थे हाथ से सारे फिसल गये

221 2121 1221 212*

अनमोल पल थे हाथ से सारे फिसल गये
अपनों ने मुंह को फेर लिया दिन बदल गये।।

कुछ ख्वाब छूटे कुछ हुए पूरे, हुआ सफर
यादो के साथ साल महीने निकल गये।।

शरमा के मुस्कुरा के जो उनकी नजर झुकी
मदहोश हुस्न ने किया बस दिल मचल गये।।

बचपन के मस्त दिन भी हुआ करते थे कभी
बस्तो के बोझ आज वो बचपन कुचल गये।।

ओढे लिबास सादगी का भ्रष्ट तंत्र में
नेता गरीब के भी निवाले निगल गये।।

करते है बेजुबान को वो क़त्ल इस तरह
वहशत को देख कर ये मनाज़िर दहल गये।।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by नाथ सोनांचली on October 10, 2016 at 2:13pm
गजल को मान देने के लिए आदरणीय श्री सुरेश जी कोटिश आभार
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 10, 2016 at 12:55pm
बचपन के मस्त दिन भी हुआ करते थे कभी
बस्तों के बोझ आज वो बचपन कुचल गये।
बहुत ही सुन्दर आदरणीय सुरेंद्र जी।
बधाई स्वीकार करें । सादर ।

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