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औपचारिक्ता की दरकार

औपचारिक्ता की दरकार "
" पागलों की तरह भागते हुए लेक्चरर शिल्पी ने कॉलेज में आये उस नवयुवक को आलिंगन में यूँ जकड़ लिया जैसे वह भाग ना पाये।यह बात पुरे कालेज में जंगल में आग की तरह फैल गयी।जितने मुँह उतनी बातें और उतने ही लांछन!
अपने ऊपर लगते लांछनों ने उसे भीतर तक तोड़ दिया और आज तो उनकी पराकाष्ठा हो गयी थी ।लेकिन कभी-भी हार ना मानने वाली शिल्पी सभ्य सहयोगियों से दो-चार हो ली।

" मैं क्यों बदचलन आवारा हूँ कोई बताएगा मुझे ? क्योकि मैं सबसे हँसकर बात करती हूँ? क्योकि मैंने माता-पिता से विद्रोह कर प्रेम- विवाह किया हैं?"

" बाकी बातों को छोड़े आज का ही प्रसंग ले लीजिये शिल्पी जी, क्या यह अमेरिका इंग्लैण्ड हैं जो आप......" वरिष्ठ मिश्रा जी ने कहा

" अमेरिका इंग्लैण्ड तो नहीं ,परन्तु तीन वर्ष बाद मिले भाई से भी औपचारिक्ता की दरकार हो सकती हैं ?" कहती शिल्पी आसुंओं के सैलाब को नहीं रोक पायी।
मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Archana Tripathi on February 28, 2016 at 2:52am
रचना को अमूल्य समय देने और समीक्षात्मक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद आदरणीया कांता जी
Comment by kanta roy on February 23, 2016 at 9:08am
वाह ! क्या गज़ब का पंच रोपित किया है आपने यहां लघुकथा में आदरणीया अर्चना जी।
गले लगना , बाहर किसी के साथ नज़र आ जाना वगैरह जैसी चीजों में , गलत प्रकरण को ढूढ़ लेना ये हमारी सोच की विडम्बना है। इन सोचों के कारण ही आज भी कितनी लडकियां घरों में अशिक्षित कैद कर ली जाती है। शक के इस प्रवृत्ति में कितने घर टूट जाते है। बहुत व्यापक चिंतन को समेत है आपने इस छोटी सी लघुकथा में। ढेरों बधाई आपको।
Comment by Archana Tripathi on February 23, 2016 at 8:56am
अंदेशा होने के बावजूद आपने सब्र से कथा पढ़ी,हार्दिक धन्यवाद आपका आदरणीय सतविंदर कुमार जी ।
Comment by Archana Tripathi on February 23, 2016 at 8:53am
हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पांडेय जी
Comment by Archana Tripathi on February 23, 2016 at 8:53am
आदरणीया सीमा जी हार्दिक धन्यवाद ,समाज की यह ओछी नजर दर्द तो देती ही हैं ।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 22, 2016 at 2:24pm
वाह्ह्ह्! कथा के पहले वाक्य को पढ़ते ही अंदेशा सा होने लगा था कि यह किस और बढ़ेगी।पढ़ते पढ़ते अंदेशा यकीन में बदलता गया।बहुत ही सधे अंदाज़ में लोगों की मानसिकता पर कटाक्ष किया है आपने।हार्दिक बधाई
Comment by pratibha pande on February 22, 2016 at 1:31pm

तथाकथित पढ़े लिखे लोगों का भी अक्सर ये  ही दृष्टिकोण होता है ,बहुत सार्थक लघु कथा बुनी है आपने सुगढ़ित शिल्प के साथ ,हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीया अर्चना जी 

Comment by Seema Singh on February 18, 2016 at 8:48pm
बहुत खूब दीदी, समाज की नज़र का क्या कहिये।सारी मर्यादाएं शिष्टाचार स्त्री के ही तो हिस्सें में हैं। बधाई इस कथा के लिए।

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