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गजल - जिन्दगी का एक पन्ना और गया।

२१२२ २१२२ २१२

जिन्दगी का एक पन्ना और गया।
याद तेरी छोडकर सब ले चला।

कुछ तो गम की बेडियों में कैद था।
कुछ हमेशा वक्त को रोता रहा।

हम रखे बस हर घडी तेरी खबर।
दीन दुनिया से हमें लेना है क्या।

जानकर पहचान कर अनजान है।
बेरहम वो बेहया वो बेवफा।

ख्वाइशें सब दिल की दिल में रह गयी।
इसकदर जालिम का हर इक लफ्ज था।

कुछ बहुत खुश हो के मिलते है हमें।
कुछ हमेशा देते रहते बद्दुआ।

मौलिक व अप्रकाशित ।

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Comment by Samar kabeer on January 1, 2016 at 10:24pm
आपको कौन भूल सकता है भाई,चिंता न करें सब परेशानियां दूर हो जाएँगी,हर रात की सहर है!
Comment by Rahul Dangi Panchal on January 1, 2016 at 10:04pm
आदरणीय Samar kabeer साहब जी कुछ लिखा ही बहुत दिन बाद है इन दिनों बहुत जटिल समस्याओं के दौर से गुजर रहा हूँ शायद जिन्दगी में इनसे बुरे दिन फिर न आये। ऐसा लग रहा था लिखना भूल गया हूँ फिर कुछ कोशिश आपको पसन्द आयी शुक्रिया । खुशी इस बात है कि मेरा परिवार OBO मुझे भूला नहीं ।
Comment by Rahul Dangi Panchal on January 1, 2016 at 10:00pm
आदरणीय श्याम नरायण जी शुक्रिया व नववर्ष की ढेरों शुभकामनाएँ
Comment by Samar kabeer on January 1, 2016 at 3:57pm
जनाब राहुल डांगी जी आदाब, बहुत दिन बाद आपकी ग़ज़लः पढ़ने को मिली,बहुत ख़ूब वाह,बधाई स्वीकार करें |
Comment by Shyam Narain Verma on January 1, 2016 at 11:32am
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर ग़ज़ल पर

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