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नस्री नज़्म :- "तीसरा विश्व युद्ध"

आत्म ग्लानी से
मेरी गर्दन झुक जाती है
जब मैं यह देखता हूँ
कि इंसान ,तरक़्क़ी करते करते
इन हदों पर पहुँच चुका है
कि उसने,
पिशाच का रूप ले लिया है,
आज हम तीसरे विश्व युद्ध के
दहाने पर खड़े हैं,
इसी पिशाचता के कारण,
ताक़त की भूक
बहुत बढ़ गई है,
अब सिर्फ़,एक चिंगारी की आवश्यकता है,
और युद्ध शुरू,
परिणाम ?
तबाही ,बर्बादी
नरसंहार ,ख़ून के दरिया
लाशों के अंबार
भूक,लाचारी,
इंसानी जान की कोई क़ीमत नहीं,
सब मूकदर्शक बने हुवे हैं
और ये सब होकर रहेगा,
कौन इसे रोक पायेगा ?
आत्म ग्लानी से
मेरी गर्दन झुकी हुई है ।

समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 3, 2015 at 1:18pm
सही समय पर सही प्रस्तुति । संकेत ऐसे ही हैं। सदचिन्तन ऐसा ही है। शुरू से अंत तक सत्यार्थ। हृदयतल से बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय समर कबीर जी। कृपया नस्री नज़्म की परिभाषा समझाईयेगा मेरी जानकारी के लिए। क्या अंतिम दो पंक्तियाँ पलट कर लिख सकते हैं, जिससे कि नज़्म "आत्म ग्लानी सेआत्म ग्लानी तक" पहुंच जायेगी !
Comment by jyotsna Kapil on December 3, 2015 at 6:38am
मानव की बढ़ती असम्वेदनशीलता को दर्शाती सुंदर रचना के बधाई आदरणीय समर कबीर जी।
Comment by Sushil Sarna on December 2, 2015 at 6:41pm

इंसानी जान की कोई क़ीमत नहीं,
सब मूकदर्शक बने हुवे हैं
और ये सब होकर रहेगा,
कौन इसे रोक पायेगा ?
आत्म ग्लानी से
मेरी गर्दन झुकी हुई है ।
एक कटु सच्चाई जिसे आपने बड़ी ही सूक्षमता से चित्रित किया है। इस श्रेष्ठ रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय।

Comment by kanta roy on December 2, 2015 at 6:31pm

बिलकुल सच कहा है आपने, आत्मग्लानि से सच में ये गर्दन झुक जाती है।  पृथ्वी को मावनवता का , सौहार्दता का सन्देश देने के लिए  आये हुए , हम  अपने लक्ष्यों से भट गए , जाने हम कहाँ से कहाँ पहुंच गए ! अति संवेदनशील लेखन हुआ है यहां आपका आदरणीय समर कबीर जी।  बधाई। 

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