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उसने कामवाली को जरा-सा जोर से क्या डांट दिया, पति और बेटे दोनों ने ये कहकर अयोग्य घोषित कर दिया कि उसकी नाहक ही परेशान होने उम्र नहीं है। परिवार के दबाव में स्टोर की चाबी बहू को सौपते हुए उसे लगा था जैसे उसके किचन नाम के किले पर किसी ने सेंधमारी कर ली हो।  वह सोच में डूबी थी कि अचानक बहू के चिल्लाने की आवाज सुनकर बोली-

 “अरे बहू सुबह सुबह क्यों डांट रही है बच्चे को, अब एक दिन स्कूल नहीं जाएगा तो कोई पहाड़ नहीं टूट जाएगा।” दादी की शह पाकर बच्चा दादी के साथ ही लग लिया। पूरा दिन दादी के साथ ही रहा। बहू रात के भोजन के बाद बरतन समेटकर बच्चे को लेने पहुंची। “बहू अब सोते में मत ले जाओ..आज ये मेरे पास ही सोने की जिद कर रहा था इसलिए यही सुला लिया।”

बहू मन मसोसकर बच्चे की चिंता के साथ-साथ इस चिंता में चली जा रही थी कि खुद उसे नींद आएगी कि नहीं। आखिर छः सालों में पहली बार बच्चे के बगैर सोना था। बहू को चुपचाप जाते हुए देखकर, उसके चेहरे पर एक स्मित रेखा खींच आई। जैसे उसने भी दुश्मन के किले पर फतह हासिल कर ली हो।

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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Comment by मिथिलेश वामनकर on August 5, 2015 at 9:22pm

आदरणीय तेजवीर सिंह जी लघुकथा के अनुमोदन के लिए हार्दिक आभार 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on August 5, 2015 at 7:02pm

वाह आ० मिथलेश सर विचोरों के इतने सारे आयाम में कैसे आप टहल आते है?? इतनी बेहतरीन गज़ल और साथ में इतने  सूक्ष्म भावों को पिरोती लघुकथा! गजब है आपकी संवेदना! क्या कहने!

Comment by Archana Tripathi on August 5, 2015 at 5:23pm
वाह !आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी,आपने तो पूरा सौतिया डाह ही रच डाला।बहुत बेहतरीन लघुकथा नहले पर दहला पञ्च करती हुई रचना के लिए हार्दिक बधाई आपको ।
Comment by Dr. (Mrs) Niraj Sharma on August 5, 2015 at 3:07pm

बहुत खूब, इन छोटी छोटी बातों से, किले फतह करने से ही मनमुटाव पैदा होते हैं। बधाई आ. मिथिलेश वामनकर जी।

Comment by savitamishra on August 5, 2015 at 12:14pm

परिवार में ऐसी छोटी छोटी फतह किला फतह जितनी ही रोमांचक और सुखमय होता हैं ..बढ़िया कथा

Comment by TEJ VEER SINGH on August 5, 2015 at 10:35am

आदरणीय मिथिलेश जी, हार्दिक बधाई!पारिवारिक कशमकश का बेहतरीन नक्शा खींचा है!

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