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अँधेरा जमीं पे

प्‍यार करना न अब तुम सिखाना मुझे

पास फिर से बुला मत जलाना मुझे

जिन्दगी बेवफाई करे भी तो क्‍या

मौत को रूठने से मनाना मुझे।

चार कन्धे चढ़े वो चले जा रहे।

कुछ नहीं पास उनके दिखाना मुझे।

वो नहीं है किया प्‍यार जिससे कभी

याद उसकी न यारो दिलाना मुझे

मैं मनाता नही कोई उत्‍सव मगर

दीप दिल से जले तो बताना मुझे

हर तरफ जो अँधेरा जमीं पे अभी

जान दे भी उसे है मिटाना मुझे

रात भर अश्‍क गम में बहे क्‍यों सनम

दोस्‍त को अब है दुश्‍मन बनाना मुझे

मौलिक एवं अप्रकाशित अखंड गहमरी

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Comment

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 13, 2015 at 9:29am

बहुत बढ़िया गहमरी जी . बधाई .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 13, 2015 at 9:03am

दीप दिल से जले तो बताना मुझे

हर तरफ जो अँधेरा जमीं पे अभी   , बहुत सुन्दर  !! आदरणीय अखंड भाई , बढिया ग़ज़ल हुई है , बधाइयाँ ॥

Comment by Akhand Gahmari on July 12, 2015 at 12:34pm

विस्‍तृत समीक्षा मे लिए आपको नमन आदणीय मिथिलेस वामनकर जी आपके बताये मार्ग पर चलने का पूरा प्रयास करेगें। नमन स्‍वीकार करें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 12, 2015 at 12:47am

आदरणीय अखंड जी सरल सहज लफ्जों में प्रेम की बेहतरीन और शानदार ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद हाज़िर है-

प्‍यार करना न अब तुम सिखाना मुझे

पास फिर से बुला मत जलाना मुझे........... सुन्दर मतला 

जिन्दगी बेवफाई करे भी तो क्‍या

मौत को रूठने से मनाना मुझे।........... बहुत ही कमाल का शेर 

चार कन्धे चढ़े वो चले जा रहे

कुछ नहीं पास उनके दिखाना मुझे।............ बात खुल कर सामने नहीं आ रही है 

वो नहीं है किया प्‍यार जिससे कभी

याद उसकी न यारो दिलाना मुझे।.......... बहुत बढ़िया 

मैं मनाता नही कोई उत्‍सव मगर

दीप दिल से जले तो बताना मुझे।............वाह वाह बेहतरीन 

हर तरफ जो अँधेरा जमीं पे अभी

जान दे भी उसे है मिटाना मुझे।.............. बहुत ही बढ़िया शेर .... शानदार .... 

रात भर अश्‍क गम में बहे क्‍यों सनम

दोस्‍त को अब है दुश्‍मन बनाना मुझे।..... दुश्मन क्यों बनाना है बात समझ नहीं आई 

निवेदन है बह्र या वज्न अवश्य लिख दिया कीजिये मंच की परिपाटी भी है और पाठको को भी ग़ज़ल का पूरा लुत्फ़ मिल जाता है 

वज्न- 212--212--212--212

सादर 

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