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ग़ज़ल :मीआ़दे उल्फ़त देखिये

2212 2212 2212


मीआ़दे उल्फ़त देखिये पूरी हुई
इतनी सी तब तो बात अब उतनी हुई.

क्या इश्क़ में दुनिया से तू भी तंग है
क्या तंज़ तुझ पे भी मेरे जैसी हुई.

दौरे गुज़श्ता ने असर कुछ यूँ किया
टूटा हुआ मैं,तू भी है टूटी हुई.

पाया है जो मेयार तेरे इश्क़ ने
लो! ज़िन्दगी क्या! रूह भी तेरी हुई.

ऐ चाँद! मुझको खींच ले ख़ुद की तरफ़
देखूं कि छत पे होगी वो आई हुई.

उनसा खिला गमले में इक तो गुल, अरे!
ख़ुशबूू भी उसमें हू ब हू उनसी हुई.

श्री सुनील

मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on July 6, 2015 at 5:46pm

उनसा खिला गमले में इक तो गुल, अरे!
ख़ुशबूू भी उसमें हू ब हू उनसी हुई.

वाह वाह क्या कमाल का शेर बहुत खूब 

Comment by Shyam Narain Verma on July 6, 2015 at 10:00am
बहुत बढ़िया गजल बधाई आपको । 
Comment by shree suneel on July 5, 2015 at 4:54pm
धन्यवाद आदरणीया डॉ नीरज शर्मा जी.
Comment by shree suneel on July 5, 2015 at 4:51pm
आदरणीय वीनस केसरी सर जी, ग़ज़ल पे आप आये इसके लिए बहुत-बहुत शुक्रिया. आपकी उपस्थिति व सराहना से उत्साहित हूँ. इंगित मिसरे की कमी के साथ कुछ अन्य कमियों को दूर करने की कोशिश करता हूँ आदरणीय. सादर
Comment by Dr. (Mrs) Niraj Sharma on July 5, 2015 at 1:12pm

सुन्दर प्रस्तुति

Comment by वीनस केसरी on July 5, 2015 at 1:31am

बहुत शानदार ग़ज़ल हुई है
बधाई स्वीकारें

उनसा खिला गमले में इक गुल, अरे!
इस मिसरे की मात्रिकता पर पुनः गौर कर लें ...

जो सुझाव प्राप्त हुए हैं वो भी काबिले गौर हैं ...

Comment by shree suneel on July 4, 2015 at 8:57pm
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय नरेंद्र सिंह जी.
Comment by shree suneel on July 4, 2015 at 8:56pm
शुक्रिया.. शुक्रिया आदरणीया परी जी.
Comment by narendrasinh chauhan on July 4, 2015 at 6:58pm

ऐ चाँद! मुझको खींच ले ख़ुद की तरफ़
देखूं कि छत पे होगी वो आई हुई.उम्दा शेर

Comment by Pari M Shlok on July 4, 2015 at 10:10am
ऐ चाँद! मुझको खींच ले ख़ुद की तरफ़
देखूं कि छत पे होगी वो आई हुई. (उम्दा शेर )

उम्दा प्रस्तुति बधाई आपको

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