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ग़ज़ल : रूह भी इन पर्वतों की दूध जैसी है

बह्र : २१२२ २१२२ २१२२ २

 

जिस्म की रंगत भले ही दूध जैसी है

रूह भी इन पर्वतों की दूध जैसी है

 

पर्वतों से मिल यकीं होने लगा मुझको

हर नदी की नौजवानी दूध जैसी है

 

छाछ, मक्खन, घी, दही, रबड़ी छुपे इसमें

पर्वतों की ज़िंदगानी दूध जैसी है

 

सर्दियाँ जब दूध बरसातीं पहाड़ों में

यूँ लगे सारी ही धरती दूध जैसी है

 

तेज़ चलने की बिमारी हो तो मत आना

वक्त लेती है पहाड़ी, दूध जैसी है

------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 1116

Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 2, 2015 at 10:58am
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीया परी जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 2, 2015 at 10:57am
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीया कान्ता जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 2, 2015 at 10:57am
तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आदरणीय गिरिराज भंडारी जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 2, 2015 at 10:56am
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय राहुल जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 2, 2015 at 10:53am
बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय सुनील जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 2, 2015 at 10:49am
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 2, 2015 at 10:48am
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सुनील जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 2, 2015 at 10:46am
तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आदरणीय मिथिलेश जी
Comment by Pari M Shlok on July 2, 2015 at 9:17am
तेज़ चलने की बिमारी हो तो मत आना
वक्त लेती है पहाड़ी, दूध जैसी है

लाज़वाब
Comment by kanta roy on July 1, 2015 at 9:14pm
रूह भी इन पर्वतों की दूध जैसी है..... रूह का दूध जैसा निर्मल मृदल अमृत होने को साकार कर दिया आपने अपनी रचना में आदरणीय धर्मेन्द्र कुमार जी आपने वाह !!!

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