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ग़ज़ल - फिल बदीह --- फिर उसी रह गुज़र गया कोई ( गिरिराज भंडारी )

2122  1212   22  / 112

  

"क्या ज़माने से डर गया कोई
एह्द क्यूँ तोड़ कर गया कोई"

ख़्वाब मेरे कुतर गया कोई

फिर नज़र से उतर गया कोई

 

दावा पत्थर का था , मगर गिर के

शीशे जैसे बिखर गया कोई

 

तेरे वादे पे ऐतबार किया

यानी बे मौत मर गया कोई

 

बाइसे बे वफाई जान तो ले     -- कारण 

क्यों वफा से मुकर गया कोई

 

एक इनकार तेरी सुन कर ही

देख कितना बिखर गया कोई

 

तेरे अल्फाज़ थे या जादू था

सुन के कितना सँवर गया कोई

 

है जहाँ फानी , तू पलक झपका

और याँ से ग़ुज़र गया कोई

 

इस तरफ है कुआँ , उधर खाई

फिर उसी रह गुज़र गया कोई

 

वक़्त की मार जब पड़ी यारों

देखो कितना सुधर गया कोई"

 

कुछ तो लूटा ही होगा शहरों ने

"गाँव क्यूँ लौट कर गया कोई" ?

*************************** 

मौलिक एवँ अप्रकाशित 

 

Views: 873

Comment

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Comment by shree suneel on June 14, 2015 at 8:45am
एक इनकार तेरी सुन कर ही
देख कितना बिखर गया कोई... ख़ूब.
निखरी हुई ग़ज़ल दिल को छू रही है आदरणीय. हार्दिक बधाई आपको.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 13, 2015 at 4:07pm

आदरणीय धर्मेन्द्र भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार ।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 13, 2015 at 4:02pm
अच्छे अश’आर हुए हैं आदरणीय गिरिराज जी, दाद कुबूल करें

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 13, 2015 at 9:03am

आदरणीय वीनस भाई , इतनी सारी कमियों के बावज़ूद  आपने ग़ज़ल की सराहना की ये आपका गज़ल सीखने वालों के प्रति प्यार और ज़िम्मेदारी की भावना को दर्शाता है । सुधार कर रहा हूँ , ऐसे ही मार्ग दर्शन करते रहियेगा । आपका बहुत शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 13, 2015 at 9:00am

आदरणीय समर भाई , आपकी सलाहों और इनायतों का तहे दिल से शुक्रिया , आवश्यक सुधार कर रहा हूँ । 

Comment by वीनस केसरी on June 12, 2015 at 11:31pm

बाकमाल अशआर हुए हैं ... मुकम्मल ग़ज़ल खूबसूरत है 

कई मिसरों पर समर साहब ने इंगित कर ही दिया है ...कुछ और जगह भी ध्यान दे लें ...


एक इनकार तेरा सुन कर ही ......... इनकार तेरी
तेरे अल्फाज़ थे या जादू थे ................जादू था

मतला और हुस्ने मतला और बेहतर हो सकते हैं ...

साफ़ सुथरी हो जाए तो ग़ज़ल आला दर्ज़े की है /.....

Comment by Samar kabeer on June 12, 2015 at 4:02pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी,आदाब,आपका एक कमाल तो यह है की आप फ़िल बदीह ग़ज़ल कह रहे हैं इसकी अलग से दाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

इस ग़ज़ल का मतला :-

"फिर जमाने दे डर गया कोई
फिर अहद तोड़ कर गया कोई"

ये मतला इस तरह होना चाहिए

"क्या ज़माने से डर गया कोई
एह्द क्यूँ तोड़ कर गया कोई"

सही शब्द है "एह्द" और ऊला और सानी में फिर-फिर की तकरार अच्छी नहीं लग रही ।


"शीशा जैसे बिखर गया कोई"

इस मिसरे को इस तरह करना उचित होगा :-

"शीशे जैसा बिखर गया कोई"

"यूँ ही कितना सुधर गया कोई"

इस मिसरे को इस तरह करना उचित होगा :-

"देखो कितना सुधर गया कोई"

"लौट क्यूँ गाँव-घर गया कोई ?"

इस मिसरे को इस तरह करना उचित होगा

"गाँव क्यूँ लौट कर गया कोई"

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 11, 2015 at 4:20pm

आदरणीय राहुल भाई , गज़ल कीसरहना के लिये आपका ह्र्दय से आभारी हूँ ।

आपकी शंका निर्मूल नहीं है , अभी मतले के हिसाब से काफिया उतर ही आ रहा है , परिवर्तन करना  करना पड़ेगा , आपका आभार ।

Comment by Rahul Dangi Panchal on June 11, 2015 at 4:03pm
आदरणीय बहुत सुन्दर गजल हुई है बधाई हो
परन्तु क्रपया मेरे मन की एक उलझन दूर करें
काफिया- उतर गया कोई| है मगर दूसरे शेर में आपने बिखर गया लिया है यह मेरी समझ में नहीं आया क्रपया जरूर समझाए

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 11, 2015 at 1:25pm

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , आपका आभार ।

कृपया ध्यान दे...

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