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चुने कंट............शक्ति छंद

दिये से दिये को जलाते चलें।
बढी आग दिल की बुझाते चलें।।
रहे प्रेम का जोश-जज्बा सदा।
चुने कंट सत्यम गहें सर्वदा।।1


नहीं दीन कोई न मजबूर हों।
सभी शाह मन के बड़े शूर हों।।
न कामी न मत्सर सहज प्यार हो।
बहन-भ्रात जैसा मिलन सार हो।।2


यहां सिंधु भव का बड़ा क्रूर है।
लिए तेज सूरज मगर सूर है।। 
यहाँ तम मिटा कर खड़ा नूर जो।
बुलाता उन्हे पास,  हैं दूर जो।।3


भिगोते रहे अश्रु मन-नैन भी।
मगर दु:ख में सुख मिले चैन भी।।
अगर प्यार-ममता लुटे राह में।
दया-सिंधु भव पार कर दाह में।।4 


के0पी0सत्यम/ मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 19, 2015 at 8:32pm

आ0  गोपाल भाई  जी,    रचना पर उपस्थिति हेतु, आपका बहुत-बहुत आभार.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 19, 2015 at 3:04pm

satyam jee

behtareen prayaas.

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