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कब सोचा था यूँ भी होगा // रवि प्रकाश

कब सोचा था यूँ भी होगा-
जिनको मैंने ये कह कर दुत्कारा था-
-"जाओ,तुम हो एक पराजित मन के हित निर्मित
केवल छलना और भुलावा,
कुछ भी तो तुम में सार नहीं है;
मेरा जीवन है अभियान सकल
दिग्विजयी स्वभाव से ही
अश्व नहीं रुकता मेरा छोटे-छोटे घाटों पर
विश्वविजय से पहले इसमें हार नहीं है..."
वही नयन दो मतवाले
मन्वंतर के बाद सही लेकिन
ले कर वही पुरानी सज-धज,ठाठ वही
दसों दिशाओं से घेरे मुझको
दर्प-गर्व और अक्खड़पन से पूछ रही हैं-
"लेकर अपने तीर-तूणीर,कृपाण सभी
कितनी धरती को तुमने जीत लिया है?
क्या तुमको ऐसा नहीं हुआ अनुभव-
परिक्रमाएँ की हैं तुमने रोज़ हमारी
हम से चल कर हम तक ही बस आए हो?"

कब सोचा था यूँ भी होगा-
वही तुम्हारी आँखें
भोर,दुपहरी,रातें बन कर
हर खिड़की से झाँकेंगी,
बादल,बूँदें,बिजली,बरखा हो कर
मेरे तन का सारा कुंदन पिघलाएँगी
सारा चंदन साँसों का
महकाएँगी;
"और डगर है क्या कोई सर्वस्व समर्पण से हट कर?"
मन ये भी पूछ न पाएगा,
निरुपाय वही खो जाएगा।
-मौलिक एवं अप्रकाशित
-28.04.2014

Views: 600

Comment

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Comment by Ravi Prakash on May 1, 2015 at 3:58pm
लिखते समय इतना नहीं सोचा था।आपसे स्नेह और आशीर्वाद पा कर मन अभिभूत हो गया है और निःसंदेह प्रेरित भी।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 1, 2015 at 1:33pm

आहत दर्प का संयत लाक्षणिक प्रयोग !

साधु ! मन झूम गया भाई रवि प्रकाश जी..

कब सोचा था यूँ भी होगा-
जिनको मैंने ये कह कर दुत्कारा था-
-"जाओ,तुम हो एक पराजित मन के हित निर्मित
केवल छलना और भुलावा,
कुछ भी तो तुम में सार नहीं है;  ...  इन पंक्तियों से प्रारम्भ हुआ उन्मुक्त दर्प
"और डगर है क्या कोई सर्वस्व समर्पण से हट कर?"
मन ये भी पूछ न पाएगा,
निरुपाय वही खो जाएगा... .... जैसी पंक्ति पर निढाल हो जाता है.

भाई, आपकी इस कविता मुग्ध कर गयी. कविता में प्रवाह है, धार है, सार है, संसार है !

अतिशय बधाइयाँ और हार्दिक शुभकामनाएँ

Comment by Ravi Prakash on April 30, 2015 at 2:52pm
धन्यवाद आदरणीय श्रीवास्तव जी।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 30, 2015 at 1:13pm

रवि प्रकाश जी

अच्छा प्रयास है .

Comment by Ravi Prakash on April 29, 2015 at 11:11pm
आदाब जनाब और ज़र्रानवाज़ी के लिए शुक्रिया।
Comment by Samar kabeer on April 29, 2015 at 6:30pm
जनाब रवि प्रकाश जी,आदाब,सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें |
Comment by Ravi Prakash on April 29, 2015 at 10:36am
धन्यवाद आदरणीय।
Comment by shree suneel on April 29, 2015 at 8:16am
वाह... बहुत बढि़या.. सुन्दर रचना आदरणीय रवि प्रकाश जी, बधाई आपको.
Comment by Ravi Prakash on April 29, 2015 at 7:33am
कोटि कोटि धन्यवाद आ॰ मिथिलेश जी।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 28, 2015 at 10:02pm

आदरणीय प्रकाश जी इस सशक्त रचना पर हार्दिक बधाई 

इन पंक्तियों की लयात्मकता ने मुग्ध कर दिया-

कब सोचा था यूँ भी होगा-
वही तुम्हारी आँखें
भोर,दुपहरी,रातें बन कर
हर खिड़की से झाँकेंगी,
बादल,बूँदें,बिजली,बरखा हो कर
मेरे तन का सारा कुंदन पिघलाएँगी
सारा चंदन साँसों का
महकाएँगी;
"और डगर है क्या कोई सर्वस्व समर्पण से हट कर?"
मन ये भी पूछ न पाएगा,
निरुपाय वही खो जाएगा।

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